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कक्षा 11 · भौतिकीJEE MAIN × NEETEnglish
§ 11.1NCERT कक्षा 11 · भौतिकी · अध्याय 11

ऊष्मीय साम्यावस्था, शून्यवाँ नियम तथा कार्य एवं ऊष्मा की संकल्पना

ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) भौतिक विज्ञान की वह शाखा है जो ऊष्मा ऊर्जा के यांत्रिक कार्य में तथा यांत्रिक कार्य के ऊष्मा ऊर्जा में रूपांतरण का स्थूल (macroscopic) अध्ययन करती है। यांत्रिकी के विपरीत जहाँ किसी कण की स्थिति और संवेग द्वारा व्याख्या की जाती है, ऊष्मागतिकी में निकाय का वर्णन स्थूल चरों जैसे दाब (P), आयतन (V), तापमान (T), आंतरिक ऊर्जा (U) तथा मोलों की संख्या (n) द्वारा किया जाता है।

1. ऊष्मागतिकीय निकाय एवं परिसीमाएं (Systems and Boundaries)

ऊष्मागतिकीय निकाय (Thermodynamic System): ब्रह्मांड का वह निश्चित भाग जिसका ऊष्मागतिकी के दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है, निकाय कहलाता है। निकाय के बाहर का शेष भाग परिवेश (Surroundings) कहलाता है:

  • खुला निकाय (Open System): परिवेश के साथ ऊर्जा (ऊष्मा एवं कार्य) तथा द्रव्य दोनों का विनिमय कर सकता है (उदा. खुले बीकर में उबलता जल)।
  • बंद निकाय (Closed System): परिवेश के साथ केवल ऊर्जा का विनिमय कर सकता है, द्रव्य का नहीं (उदा. गतिमान पिस्टन लगे बेलन में बंद गैस)।
  • विलगित निकाय (Isolated System): परिवेश के साथ न तो ऊर्जा का और न ही द्रव्य का विनिमय कर सकता है (उदा. पूर्णतः ऊष्मारोधी बंद थर्मस फ्लास्क)।

ऊष्माचालक भित्ति (Diathermic Wall)

ऐसी परिसीमा जो निकाय तथा परिवेश के मध्य ऊष्मा के प्रवाह की पूर्ण अनुमति देती है, जब तक कि ऊष्मीय साम्य स्थापित न हो जाए। उदा. तांबे या एल्युमिनियम की पतली चादर।

रुद्धोष्म भित्ति (Adiabatic Wall)

ऐसी पूर्णतः ऊष्मारोधी परिसीमा जो निकाय और परिवेश के बीच किसी भी प्रकार के ऊष्मा विनिमय को पूर्णतः रोकती है (ΔQ = 0)। उदा. एस्बेस्टस, काँच की रुई या वैक्यूम दीवार।

2. ऊष्मागतिकीय साम्यावस्था (Thermodynamic Equilibrium)

कोई निकाय ऊष्मागतिकीय साम्यावस्था में तब कहलाता है जब उसके स्थूल अवस्था चर समय के साथ स्वतः परिवर्तित नहीं होते। इसके लिए तीन प्रकार के साम्य का एक साथ उपस्थित होना आवश्यक है:

  1. यांत्रिक साम्यावस्था (Mechanical Equilibrium): निकाय के अंदर अथवा निकाय और परिवेश के बीच कोई असंतुलित बल नहीं होना चाहिए (सर्वत्र एकसमान दाब)।
  2. रासायनिक साम्यावस्था (Chemical Equilibrium): निकाय में कोई स्वतः रासायनिक अभिक्रिया न हो रही हो तथा संघटन सर्वत्र एकसमान रहे।
  3. ऊष्मीय साम्यावस्था (Thermal Equilibrium): निकाय के विभिन्न भागों में अथवा परिसीमा के पार कोई तापांतर न हो (सर्वत्र एकसमान तापमान)।

3. ऊष्मागतिकी का शून्यवाँ नियम एवं तापमान की संकल्पना

शून्यवें नियम का कथन: यदि दो निकाय A और B किसी तीसरे निकाय C के साथ पृथक-पृथक ऊष्मीय साम्यावस्था में हों, तो निकाय A और B परस्पर भी ऊष्मीय साम्यावस्था में होते हैं।

राल्फ एच. फाउलर (1931) द्वारा प्रतिपादित यह नियम तापमान (Temperature) की वैज्ञानिक परिभाषा का आधार है। यह सिद्ध करता है कि तापमान एक ऐसा अदिश अवस्था चर है जो यह निर्धारित करता है कि दो निकाय परस्पर ऊष्मीय साम्य में हैं अथवा नहीं:

यदि TA = TC तथा TB = TC  ⇒  TA = TB

थर्मामीटर (तापमापी) इस संदर्भ में उसी तीसरे निकाय C की तरह कार्य करता है।

4. आंतरिक ऊर्जा (U)

किसी ऊष्मागतिकीय निकाय की आंतरिक ऊर्जा (U) उसके समस्त अणुओं की सभी सूक्ष्म गतियों एवं पारस्परिक आकर्षण बलों की कुल ऊर्जा का योग होती है:

  • गतिज ऊर्जा: अणुओं की स्थानांतरीय, घूर्णन एवं कंपन गतिज ऊर्जा (सीधे तौर पर तापमान T पर निर्भर)।
  • स्थितिज ऊर्जा: अंतराणुक बलों के कारण अणुओं की स्थितिज ऊर्जा (आयतन V पर निर्भर)।
एनसीईआरटी एवं जेईई महत्वपूर्ण तथ्य: एक आदर्श गैस के लिए अणुओं के बीच कोई आकर्षण बल नहीं होता, अतः स्थितिज ऊर्जा शून्य होती है। इसलिए आदर्श गैस की आंतरिक ऊर्जा केवल और केवल उसके परम ताप (T) पर निर्भर करती है (जूल का नियम):

U = n Cv T    तथा    ΔU = n Cv ΔT

आंतरिक ऊर्जा एक शुद्ध अवस्था फलन (State Function) है। किसी भी चक्रीय प्रक्रम के लिए कुल आंतरिक ऊर्जा परिवर्तन ΔUcycle = 0 होता है।

5. ऊष्मागतिकी में कार्य (Work Done)

जब किसी बेलन में भरी गैस घर्षणरहित पिस्टन के विरुद्ध धीरे-धीरे dx विस्थापित होकर प्रसार करती है, तो गैस द्वारा किया गया सूक्ष्म कार्य:

dW = F dx = (P · A) dx = P dV

प्रारंभिक आयतन V1 से अंतिम आयतन V2 तक प्रसार में गैस द्वारा किया गया कुल कार्य:

W = ∫V1V2 P dV

P-V सूचक आरेख पर ज्यामितीय महत्व: किसी भी उत्क्रमणीय प्रक्रम में किया गया कार्य P-V वक्र तथा आयतन (V) अक्ष के बीच घिरे क्षेत्रफल के ठीक बराबर होता है।

  • प्रसार (V2 > V1): आयतन बढ़ता है ⇒ निकाय द्वारा कार्य किया गया (ΔW > 0 धनात्मक)।
  • संपीडन (V2 < V1): आयतन घटता है ⇒ निकाय पर कार्य किया गया (ΔW < 0 ऋणात्मक)।
  • चक्रीय प्रक्रम: दक्षिणावर्त (Clockwise) चक्र में शुद्ध कार्य धनात्मक (ऊष्मा इंजन) होता है, जबकि वामावर्त (Counter-clockwise) चक्र में शुद्ध कार्य ऋणात्मक (प्रशीतक) होता है।

6. ऊष्मा (ΔQ) बनाम कार्य (ΔW): पथ फलन

विशेषताआंतरिक ऊर्जा (U)ऊष्मा (Q) एवं कार्य (W)
प्रकृतिअवस्था फलन (State Function)पथ फलन (Path Function)
अवकल रूपयथार्थ अवकल (Exact differential: dU)अयथार्थ अवकल (δQ, δW)
चक्रीय प्रक्रम में मान∮ dU = 0 सदैव∮ δQ = ∮ δW ≠ 0 सामान्यतः
भौतिक अर्थनिकाय में संचित कुल ऊर्जापरिसीमा के आर-पार स्थानांतरित ऊर्जा
भौतिक विज्ञान में चिह्न परिपाटी (Sign Convention):
  • ΔQ > 0: जब निकाय को ऊष्मा दी जाती है।
  • ΔQ < 0: जब निकाय से ऊष्मा बाहर निकलती है।
  • ΔW > 0: जब निकाय द्वारा कार्य किया जाता है (प्रसार dV > 0)।
  • ΔW < 0: जब निकाय पर कार्य किया जाता है (संपीडन dV < 0)।
अतः प्रथम नियम का स्वरूप है: ΔQ = ΔU + ΔW।
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