पृष्ठ तनाव, पृष्ठ ऊर्जा, आधिक्य दाब एवं केशिकत्व
किसी द्रव का मुक्त पृष्ठ न्यूनतम पृष्ठीय क्षेत्रफल घेरने की विशिष्ट प्रवृत्ति दर्शाता है, और ऐसा व्यवहार करता है मानो वह तनी हुई प्रत्यास्थ झिल्ली हो। इस परिघटना को पृष्ठ तनाव (Surface Tension) कहते हैं। वर्षा की बूंदों का गोल होना, जल की सतह पर कीड़ों का चलना तथा केशिका नलियों में द्रव का ऊपर चढ़ना इसी पर आधारित है।
1. पृष्ठ तनाव का आणविक सिद्धांत
आणविक आकर्षण दो प्रकार का होता है: संसंजक बल (Cohesive Force) (समान द्रव अणुओं के बीच) तथा आसंजक बल (Adhesive Force) (भिन्न पदार्थों के अणुओं के बीच)। वह अधिकतम दूरी जिस तक अंतराण्विक आकर्षण प्रभावी रहता है, आणविक परास (c ≈ 10-9 m) कहलाती है।
मुक्त पृष्ठ: ~~~~~~~~~~~~~~ अणु B (पृष्ठ पर स्थित) ~~~~~~~~~~~~~~
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( | / ) आधा गोला वायु में:
( --o-- ) परिणामी नीचे की ओर संसंजक खिंचाव!
( /| ) अतिरिक्त पृष्ठ ऊर्जा U = T * Delta A
|
आंतरिक भाग: ( | / )
( --o-- ) अणु A (भीतर गहराई में)
( / | ) सभी दिशाओं से सममित खिंचाव:
परिणामी बल = 0
- द्रव के भीतर स्थित अणु: चारों ओर से समान अणुओं द्वारा आकर्षित होता है, अतः परिणामी संसंजक बल शून्य होता है।
- पृष्ठीय परत में स्थित अणु (मोटाई ≈ 10-9 m): ऊपर कोई द्रव अणु न होने के कारण भीतर की ओर एक असंतुलित परिणामी खिंचाव बल अनुभव करता है।
- पृष्ठ ऊर्जा: किसी अणु को भीतर से खींचकर पृष्ठ पर लाने में इस आंतरिक आकर्षण बल के विरुद्ध कार्य करना पड़ता है। यह कार्य पृष्ठ पर अणुओं में स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित होता है, जिसे पृष्ठ ऊर्जा कहते हैं। न्यूनतम स्थितिज ऊर्जा की स्थिति प्राप्त करने के लिए द्रव अपने पृष्ठ क्षेत्रफल को सिकोड़कर न्यूनतम करने का प्रयास करता है।
2. मात्रात्मक परिभाषा एवं पृष्ठ ऊर्जा संबंध
द्रव के मुक्त पृष्ठ पर खींची गई काल्पनिक रेखा की प्रति एकांक लंबाई पर पृष्ठ के स्पर्शरेखीय कार्य करने वाले बल को पृष्ठ तनाव (T अथवा S) कहते हैं:
- SI मात्रक: N/m अथवा J/m2।
- विमीय सूत्र: [T] = [M1 L0 T-2] (कमानी नियतांक k के समान)।
पृष्ठ तनाव एवं पृष्ठ ऊर्जा में संबंध
L चौड़ाई के U-आकार के तार के फ्रेम पर साबुन की झिल्ली पर विचार करें। चूंकि झिल्ली के दो मुक्त पृष्ठ (ऊपर व नीचे) होते हैं, अतः स्लाइडर पर भीतर की ओर कुल बल F = 2TL होता है। स्लाइडर को Δ x दूरी तक बाहर खींचने में किया गया कार्य:
बूंदों के विखंडन एवं संलयन में कार्य
- R त्रिज्या की 1 बड़ी बूंद को n समान छोटी बूंदों (r त्रिज्या) में तोड़ना:
आयतन संरक्षण से: r = R / n1/3।
Δ A = n(4π r2) - 4π R2 = 4π R2 (n1/3 - 1)W = T · Δ A = 4π T R2 (n1/3 - 1)चूंकि ऊर्जा अवशोषित होती है, अतः बूंदों का तापमान घट जाता है (शीतलन होता है): Δ θ = 3T/(ρ s)(1/r - 1/R)।
- R1 से R2 त्रिज्या का साबुन का बुलबुला फुलाने में कार्य (2 पृष्ठ!):
W = T · Δ Atotal = 8π T (R22 - R12)
3. बूंदों एवं बुलबुलों के भीतर आधिक्य दाब
पृष्ठ तनाव के कारण मुड़ा हुआ वक्र पृष्ठ अवतल दिशा की ओर परिणामी संकुचन बल लगाता है। यांत्रिक संतुलन के लिए अवतल भाग का दाब उत्तल भाग के दाब से आधिक्य दाब (Δ P) अधिक होना चाहिए:
| अंतरापृष्ठ | मुक्त पृष्ठों की संख्या | आधिक्य दाब (Δ P = Pin - Pout) | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| गोलीय द्रव बूंद | 1 पृष्ठ (द्रव-वायु) | Δ P = 2T/R |
वर्षा की बूंद, पारे की बूंद |
| द्रव के भीतर वायु का बुलबुला | 1 पृष्ठ (वायु-द्रव) | Δ P = 2T/R |
जल में उठने वाला वायु बुलबुला |
| खोखला साबुन का बुलबुला | 2 पृष्ठ (भीतरी व बाहरी) | Δ P = 4T/R |
साबुन के घोल का बुलबुला |
| बेलनाकार द्रव जेट | 1 बेलनाकार पृष्ठ | Δ P = T/R |
नोजल से निकलती द्रव धारा |
4. स्पर्श कोण एवं केशिकीय उन्नयन (ज्यूरिन का नियम)
स्पर्श कोण (θc)
ठोस व द्रव के संपर्क बिंदु पर द्रव के पृष्ठ पर खींची गई स्पर्श रेखा तथा ठोस के पृष्ठ के मध्य (द्रव के अंदर की ओर मापा गया) कोण स्पर्श कोण कहलाता है:
- न्यूनकोण (θc < 90°): आसंजक बल संसंजक बलों से प्रबल होते हैं। द्रव ठोस को भिगोता है, चंद्रतल अवतल होता है, और द्रव केशिका नली में ऊपर चढ़ता है (जैसे कांच पर शुद्ध जल, θc ≈ 0°)।
- अधिककोण (θc > 90°): संसंजक बल प्रभावी होते हैं। द्रव ठोस को नहीं भिगोता, चंद्रतल उत्तल होता है, और द्रव केशिका नली में नीचे गिरता है (जैसे कांच पर पारा, θc ≈ 135°)।
केशिकीय उन्नयन सूत्र की व्युत्पत्ति
त्रिज्या r की कांच की केशिका नली को ρ घनत्व तथा T पृष्ठ तनाव वाले द्रव में डुबोने पर:
| |
| | केशिका नली की आंतरिक त्रिज्या r
| | चंद्रतल की वक्रता त्रिज्या R = r / cos(theta)
|()| अवतल चंद्रतल
| |
| | ऊपर की ओर पृष्ठ तनाव बल:
| | Fup = T * (2 * pi * r) * cos(theta)
| |
| | स्तंभ के भार से संतुलन:
| | W = m * g = (pi * r2 * h) * rho * g
~~~~~~~+--+~~~~~~~ मुक्त द्रव तल
परिधि के अनुदिश ऊपर की ओर कुल खिंचाव बल: Fup = (2π r) T cos θc।
ऊपर चढ़े द्रव स्तंभ का भार: W = (π r2 h)ρ g।
संतुलन में (Fup = W):
ज्यूरिन का नियम एवं अपर्याप्त नली की लंबाई
- ज्यूरिन का नियम (Jurin's Law): दिए गए द्रव-ठोस युग्म के लिए, h · r = स्थिरांक। संकीर्ण नली में द्रव अधिक ऊंचाई तक चढ़ता है।
- अपर्याप्त लंबाई वाली नली (l < h): यदि l < h लंबाई की नली जल में रखी जाए, तो जल ऊपरी किनारे तक चढ़कर रुक जाता है। जल कभी बाहर नहीं छलक सकता! चंद्रतल चपटा होकर अपनी वक्रता त्रिज्या R से बढ़ाकर R' कर लेता है:
l · R' = h · R ⇒ R' = R (h/l)
JEE एवं NEET हल किए गए अभ्यास प्रश्न
साबुन के बुलबुले में दो मुक्त पृष्ठ (भीतरी व बाहरी) होते हैं।
प्रारंभिक त्रिज्या R1 = 0, अंतिम त्रिज्या R2 = 0.05 m।
कुल क्षेत्रफल वृद्धि:
किया गया कार्य:
(a) आंतरिक त्रिज्या r = d/2 = 0.2 mm = 2 × 10-4 m।
सैद्धांतिक केशिकीय उन्नयन:
(b) उपलब्ध लंबाई l = 3 cm = 0.03 m < h होने पर, जल शीर्ष तक चढ़कर बिना छलके चपटा हो जाता है।
चूंकि h R = l R', तथा प्रारंभ में R = r / cos 0° = 0.2 mm:
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
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