कार्बनिक अभिक्रिया क्रियाविधियों की मूलभूत संकल्पनाएं
सहसंयोजक आबंध विदलन (समांशी एवं विषमांशी), अभिक्रिया मध्यवर्ती (कार्बोकेटायन, कार्बऋणायन, मुक्त मूलक), आक्रमणकारी अभिकर्मक (इलेक्ट्रॉनस्नेही व नाभिकस्नेही) तथा सहसंयोजक आबंधों में इलेक्ट्रॉनिक विस्थापन प्रभावों का विस्तृत NCERT विश्लेषण।
1. सहसंयोजक आबंध का विदलन (Fission of Covalent Bond)
कार्बनिक अभिक्रियाओं में क्रियाधार (substrate) के पुराने आबंध टूटते हैं तथा नए आबंध बनते हैं। आबंध का टूटना दो प्रकार से हो सकता है:
A. विषमांशी विदलन (Heterolytic Fission / Heterolysis)
इसमें आबंध इस प्रकार टूटता है कि साझे का इलेक्ट्रॉन युगल बंधित परमाणुओं में से किसी एक परमाणु के साथ चला जाता है:
- कार्बोधनायन (Carbocation): जब कार्बन से जुड़ा परमाणु अधिक विद्युतऋणात्मक हो, तो वह साझे के दोनों इलेक्ट्रॉन लेकर ऋणायन के रूप में अलग हो जाता है, जिससे कार्बन पर धन आवेश उत्पन्न होता है:
R3C − Z → R3C+ (कार्बोधनायन) + :Z−कार्बोधनायन कार्बन sp2 संकरित होता है, इसकी ज्यामिति समतलीय त्रिकोणीय (आबंध कोण 120°) होती है और इसमें एक रिक्त असंकरित 2p कक्षक होता है (संयोजी कोश में केवल 6 इलेक्ट्रॉन — इलेक्ट्रॉन न्यून इलेक्ट्रॉनस्नेही)।
- कार्बऋणायन (Carbanion): जब कार्बन से जुड़ा समूह कार्बन से कम विद्युतऋणात्मक (उदा. धातु Li, Mg) हो, तो कार्बन साझे के दोनों इलेक्ट्रॉन अपने पास रख लेता है:
R3C − Y → R3C:− (कार्बऋणायन) + Y+कार्बऋणायन कार्बन sp3 संकरित होता है, इसकी ज्यामिति पिरामिडीय होती है और इसके पास 8 इलेक्ट्रॉन (अष्टक पूर्ण + एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युगल) होते हैं। यह नाभिकस्नेही / लुईस क्षारक की भांति व्यवहार करता है।
B. समांशी विदलन (Homolytic Fission / Homolysis)
इसमें सहसंयोजक आबंध का विदलन सममित रूप से होता है, जिससे दोनों पृथक होने वाले परमाणुओं को साझे का एक-एक इलेक्ट्रॉन प्राप्त होता है। यह प्रक्रम प्रायः अध्रुवीय आबंधों में उच्च ताप, प्रकाश (hν) अथवा परॉक्साइड की उपस्थिति में होता है:
ऐल्किल मुक्त मूलक उदासीन, 7 संयोजी इलेक्ट्रॉन युक्त, अयुग्मित इलेक्ट्रॉन के कारण अनुचुंबकीय (paramagnetic) तथा अत्यधिक क्रियाशील होते हैं।
2. अभिक्रिया मध्यवर्तियों का आपेक्षिक स्थायित्व
| मध्यवर्ती | संकरण व ज्यामिति | संयोजी इलेक्ट्रॉन | स्थायित्व क्रम | स्थायित्व का प्रमुख कारण |
|---|---|---|---|---|
| कार्बोधनायन (R+) | sp2, समतलीय त्रिकोणीय | 6 (इलेक्ट्रॉन न्यून) | 3° > 2° > 1° > CH3+ | +I प्रेरणिक प्रभाव तथा अतिसंयुग्मन (α-H संख्या: 9 > 6 > 3 > 0) |
| कार्बऋणायन (R:−) | sp3, पिरामिडीय | 8 (एकाकी युगल युक्त) | CH3− > 1° > 2° > 3° & HC≡C− > CH2=CH− > CH3CH2− | −I प्रभाव; s-लक्षण बढ़ने पर ऋणायन अधिक स्थायी (sp > sp2 > sp3); +I समूहों द्वारा प्रतिकर्षण से अस्थायित्व |
| मुक्त मूलक (R•) | sp2, समतलीय | 7 (अयुग्मित इलेक्ट्रॉन) | 3° > 2° > 1° > CH3• | अतिसंयुग्मन (σ-p अतिव्यापन) तथा अनुनाद विस्थानीकरण |
3. इलेक्ट्रॉनस्नेही एवं नाभिकस्नेही अभिकर्मक
इलेक्ट्रॉनस्नेही (Electrophiles — E+)
इलेक्ट्रॉन न्यून स्पीशीज जो रासायनिक अभिक्रिया में इलेक्ट्रॉन युगल ग्रहण करती हैं (लुईस अम्ल):
- धनावेशित इलेक्ट्रॉनस्नेही: H+, Cl+, Br+, NO2+ (नाइट्रोनियम आयन), R3C+.
- उदासीन इलेक्ट्रॉनस्नेही: BF3, AlCl3, FeCl3 (अपूर्ण अष्टक); SO3, CO2, कार्बोनिल कार्बन (>C=O).
नाभिकस्नेही (Nucleophiles — Nu:−)
इलेक्ट्रॉन समृद्ध स्पीशीज जो इलेक्ट्रॉन न्यून केंद्र को एकाकी इलेक्ट्रॉन युगल प्रदान करती हैं (लुईस क्षारक):
- ऋणावेशित नाभिकस्नेही: OH−, RO−, CN−, हैलाइड आयन (I−, Br−, Cl−), R−.
- उदासीन नाभिकस्नेही: H2O, NH3, RNH2, R−OH (एकाकी इलेक्ट्रॉन युगल युक्त).
- उभयदंती नाभिकस्नेही (Ambident Nucleophiles): जिनके पास दो भिन्न दाता परमाणु होते हैं, जैसे सायनाइड आयन ([:C≡N:]− — कार्बन से जुड़ने पर साइनाइड, नाइट्रोजन से जुड़ने पर आइसोसायनाइड).
4. सहसंयोजक आबंधों में इलेक्ट्रॉनिक विस्थापन प्रभाव
A. प्रेरणिक प्रभाव (Inductive Effect — I-Effect)
भिन्न विद्युतऋणात्मकता वाले परमाणुओं के मध्य बने σ-आबंध के इलेक्ट्रॉनों का स्थायी ध्रुवीकरण। यह श्रृंखला में आगे संचरित होता है और 3-4 कार्बनों के पश्चात नगण्य हो जाता है:
- −I प्रभाव (इलेक्ट्रॉन-आकर्षी): −NO2 > −CN > −COOH > −F > −Cl > −Br > −I > −OH > −C6H5 > −H
- +I प्रभाव (इलेक्ट्रॉन-प्रदाता): −O− > −COO− > −C(CH3)3 (3°) > −CH(CH3)2 (2°) > −CH2CH3 (1°) > −CH3 > −H
B. अनुनाद प्रभाव (Resonance / Mesomeric Effect — R/M Effect)
संयुग्मित प्रणाली में π-इलेक्ट्रॉनों अथवा एकाकी युग्म के विस्थानीकरण द्वारा उत्पन्न स्थायी प्रभाव:
- +R / +M प्रभाव: इलेक्ट्रॉन युग्म संयुग्मित तंत्र (जैसे बेन्जीन वलय) को प्रदान करते हैं (ortho-para दिष्टकारी): −OH, −OR, −NH2, −NHR, −Cl, −Br.
- −R / −M प्रभाव: इलेक्ट्रॉन घनत्व को संयुग्मित तंत्र से अपनी ओर खींचते हैं (meta दिष्टकारी): −NO2, −CN, −CHO, >C=O, −COOH.
C. इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (Electromeric Effect — E-Effect)
आक्रमणकारी अभिकर्मक की मांग पर बहु-आबंध के π-इलेक्ट्रॉनों का किसी एक बंधित परमाणु पर पूर्ण स्थानांतरण। यह एक अस्थायी प्रभाव है (+E तथा −E प्रभाव)।
D. अतिसंयुग्मन (Hyperconjugation — बेकर-नाथन प्रभाव / आबंध-रहित अनुनाद)
असंतृप्त निकाय अथवा कार्बोधनायन से सीधे जुड़े एल्किल समूह के C−H σ-इलेक्ट्रॉनों का संलग्न रिक्त या आंशिक भरे p-कक्षक के साथ विस्थानीकरण:
- इसके लिए sp2 कार्बन के समीपवर्ती कार्बन पर कम से कम एक α-हाइड्रोजन होना अनिवार्य है।
- अतिसंयुग्मी संरचनाओं की संख्या = (α-हाइड्रोजन संख्या) + 1.
- एल्कीनों का स्थायित्व α-हाइड्रोजन की संख्या बढ़ने पर बढ़ता है।
5. अभ्यास प्रश्न एवं हल
कारण: एथिल धनायन में 3 α-H, आइसोप्रोपिल में 6 α-H, तथा तृतीयक ब्यूटिल में 9 α-H अतिसंयुग्मन संरचनाएं बनाते हैं। बेन्जिल कार्बोधनायन में बेन्जीन वलय के साथ अनुनाद द्वारा धन आवेश 4 स्थितियों पर विस्थानीकृत हो जाता है।
केवल इसी डिवाइस पर सेव — कोई अकाउंट या साइन-इन नहीं।