ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन: बेंजीन, ऐरोमैटिकता एवं EAS अभिक्रियाएं
ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (जिन्हें ऐरीन भी कहा जाता है) विशिष्ट स्थायित्व एवं अभिलाक्षणिक रासायनिक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं जिसे ऐरोमैटिक लक्षण कहते हैं। ऐल्कीनों के विपरीत ये आसानी से योग अभिक्रियाएं न देकर अपनी वलय की ऐरोमैटिकता बनाए रखने के लिए मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनरागी ऐरोमैटिक प्रतिस्थापन (EAS) अभिक्रियाएं देते हैं।
1. बेंजीन की संरचना एवं स्थायित्व
बेंजीन को 1825 में माइकल फैराडे द्वारा पृथक किया गया था। इसका अणुसूत्र C6H6 है। 1865 में अगस्त केंकुले ने एकांतर एकल एवं द्वि-आबंध युक्त षट्कोणीय वलय संरचना प्रस्तावित की थी।
बेंजीन संरचना के प्रायोगिक प्रमाण
- समान आबंध लंबाई: बेंजीन में सभी छह C–C आबंध लंबाइयां एकसमान 139 pm होती हैं (एकल आबंध 154 pm एवं द्वि-आबंध 134 pm के मध्यवर्ती)।
- समतलीय षट्कोणीय ज्यामिति: सभी छह कार्बन परमाणु sp2 संकरित होते हैं और आबंध कोण 120° होता है।
- हाइड्रोजनीकरण ऊष्मा: बेंजीन की प्रायोगिक हाइड्रोजनीकरण ऊष्मा −208 kJ mol−1 है, जबकि परिकल्पित 1,3,5-साइक्लोहेक्साट्राई-ईन के लिए यह 3 × (−119.5) = −358.5 kJ mol−1 होती।
- अनुनाद ऊर्जा: अंतर 358.5 − 208 = 150.5 kJ mol−1 (36 kcal mol−1) बेंजीन की अनुनाद स्थायित्व ऊर्जा है।
बेंजीन का कक्षक चित्र (Orbital Picture)
प्रत्येक कार्बन तीन sp2 संकरित कक्षकों द्वारा तीन σ-आबंध (दो निकटवर्ती कार्बनों से तथा एक हाइड्रोजन से) बनाता है। प्रत्येक कार्बन पर वलय तल के लंबवत उपस्थित असंकरित 2pz कक्षक पार्श्वीय अतिव्यापन द्वारा वलय के ऊपर तथा नीचे एक सतत, विस्थानीकृत 6π इलेक्ट्रॉन अभ्र (delocalised cloud) बनाते हैं।
2. हॉकेल का ऐरोमैटिकता का नियम (Hückel's Rule)
1931 में हॉकेल ने समतलीय एकचक्रीय वलयों में ऐरोमैटिकता के लिए निम्नलिखित चार आवश्यक शर्तें प्रतिपादित कीं:
- चक्रीय (Cyclic) हो तथा p-कक्षकों का सतत लूप उपस्थित हो।
- समतलीय (Planar) हो (ताकि p-कक्षकों का समानांतर अतिव्यापन प्रभावी हो सके)।
- वलय में पूर्ण संयुग्मन (complete conjugation) हो।
- उसमें (4n + 2) विस्थानीकृत π-इलेक्ट्रॉन हों, जहाँ n = 0, 1, 2, 3... (अर्थात् 2, 6, 10, 14, 18 π इलेक्ट्रॉन)।
| श्रेणी | इलेक्ट्रॉन संख्या एवं ज्यामिति | आपेक्षिक स्थायित्व | प्रमुख उदाहरण |
|---|---|---|---|
| ऐरोमैटिक (Aromatic) | चक्रीय, समतलीय, पूर्ण संयुग्मित, (4n+2) π e− | अत्यधिक स्थायी (उच्च अनुनाद ऊर्जा) | बेंजीन (6π, n=1), साइक्लोप्रोपेनाइल धनायन (2π, n=0), साइक्लोपेंटाडाइएनाइल ऋणायन (6π, n=1), ट्रोपिलियम धनायन (6π, n=1), नैफ्थालीन (10π, n=2), पिरिडीन, पिरोल, फ्यूरॉन |
| प्रति-ऐरोमैटिक (Anti-aromatic) | चक्रीय, समतलीय, पूर्ण संयुग्मित, (4n) π e− | अत्यधिक अस्थायी (विवृत शृंखला से भी कम स्थायी) | साइक्लोब्यूटाडाईन (4π, n=1), साइक्लोपेंटाडाइएनाइल धनायन (4π, n=1) |
| गैर-ऐरोमैटिक (Non-aromatic) | अचक्रीय, असमतलीय, या विच्छिन्न संयुग्मन (sp3 कार्बन) | सामान्य विवृत-शृंखला यौगिकों जैसा स्थायित्व | साइक्लोऑक्टाटेट्राईन (टब के आकार की असमतलीय ज्यामिति), साइक्लोपेंटाडाईन |
3. इलेक्ट्रॉनरागी ऐरोमैटिक प्रतिस्थापन (EAS) की क्रियाविधि
वलय तल के ऊपर तथा नीचे विस्थानीकृत π-इलेक्ट्रॉन मेघ की उपस्थिति के कारण बेंजीन इलेक्ट्रॉन-धनी (नाभिकरागी) की भांति कार्य करता है और इलेक्ट्रॉनरागियों (E+) को आकर्षित करता है। EAS तीन पदों में संपन्न होती है:
EAS क्रियाविधि के तीन पद
- इलेक्ट्रॉनरागी (E+) का निर्माण: लुईस अम्ल उत्प्रेरक द्वारा अभिकर्मक का ध्रुवीकरण या विषमांगी विखंडन कर सक्रिय धनायन बनाया जाता है।
- सिग्मा-संकुल (ऐरेनियम आयन / व्हीलैंड मध्यवर्ती) का निर्माण: बेंजीन का π-इलेक्ट्रॉन युग्म E+ पर आक्रमण करता है। एक कार्बन sp3 संकरित हो जाता है जिससे वलय की ऐरोमैटिकता भंग हो जाती है। धन आवेश ऑर्थो तथा पैरा स्थितियों पर विस्थानीकृत होता है (यह दर-निर्धारक पद, RDS है)।
- प्रोटॉन का निष्कासन (Deprotonation): एक दुर्बल क्षार sp3 कार्बन से H+ को ग्रहण कर लेता है, जिससे वलय की 6π ऐरोमैटिक प्रकृति पुनः स्थापित हो जाती है।
गतिक समस्थानिक प्रभाव (Kinetic Isotope Effect)
चूंकि C–H आबंध का टूटना पद 3 (तीव्र पद) में होता है, अतः सामान्य बेंजीन (C6H6) तथा हेक्साड्यूटेरोबेंजीन (C6D6) के नाइट्रीकरण एवं ब्रोमीनीकरण की दर समान होती है (kH/kD ≈ 1)। सल्फोनीकरण में विप्रोटोनीकरण आंशिक रूप से दर-निर्धारक होता है, अतः उसमें समस्थानिक प्रभाव देखा जाता है।
4. बेंजीन की पांच क्लासिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएं
| अभिक्रिया | अभिकर्मक / उत्प्रेरक | सक्रिय इलेक्ट्रॉनरागी | रासायनिक रूपांतरण |
|---|---|---|---|
| हैलोजनन | Cl2 या Br2 + निर्जल FeCl3 या AlCl3 | Cl+ (क्लोरोनियम) या Br+ | C6H6 + Cl2 → C6H5Cl (क्लोरोबेंजीन) + HCl |
| नाइट्रीकरण | सांद्र HNO3 + सांद्र H2SO4 (नाइट्रेटिंग मिश्रण, 323–333 K) | NO2+ (नाइट्रोनियम आयन) | C6H6 + HNO3 → C6H5NO2 (नाइट्रोबेंजीन) + H2O |
| सल्फोनीकरण | सधूम H2SO4 (ओलियम = H2SO4 + SO3) | SO3 (उदासीन सल्फर ट्राइऑक्साइड) | C6H6 + SO3 → C6H5SO3H (बेंजीनसल्फोनिक अम्ल) |
| फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐल्किलीकरण | R–Cl + निर्जल AlCl3 | R+ (कार्बधनायन मध्यवर्ती) | C6H6 + CH3Cl → C6H5CH3 (टॉलूईन) + HCl |
| फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐसीलीकरण | R–COCl या (RCO)2O + निर्जल AlCl3 | R–C≡O+ (ऐसीलियम आयन) | C6H6 + CH3COCl → C6H5COCH3 (ऐसीटोफीनोन) + HCl |
- कार्बधनायन पुनर्विन्यास: 1-क्लोरोप्रोपेन के साथ ऐल्किलीकरण कराने पर प्राथमिक कार्बधनायन हाइड्राइड स्थानांतरण द्वारा द्वितीयक में पुनर्व्यवस्थित होकर आइसोप्रोपिलबेंजीन (क्यूमीन, ~65%) मुख्य उत्पाद बनाता है। ऐसीलीकरण में यह समस्या नहीं होती क्योंकि ऐसीलियम आयन अनुनाद स्थायी होता है।
- पॉलीऐल्किलीकरण: ऐल्किल समूह वलय को सक्रिय करता है जिससे पॉलीऐल्किलीकरण हो जाता है, जबकि ऐसील समूह निष्क्रियक होने के कारण अभिक्रिया एकल प्रतिस्थापन पर रुक जाती है।
- तीव्र निष्क्रिय वलयों की असफलता: नाइट्रोबेंजीन, बेन्जोइक अम्ल तथा बेन्जैल्डिहाइड फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया नहीं देते।
- ऐनिलीन की असफलता: ऐनिलीन का −NH2 समूह AlCl3 उत्प्रेरक के साथ लुईस अम्ल-क्षार संकुल (−NH2+–AlCl3−) बना लेता है, जिससे वलय तीव्र रूप से निष्क्रिय हो जाता है।
5. दिष्टकारी प्रभाव (Directive Influence)
ऑर्थो तथा पैरा दिष्टकारी सक्रियक समूह
वे समूह जो +R अनुनाद प्रभाव या +I/अतिसंयुग्मन प्रभाव द्वारा ऑर्थो एवं पैरा स्थितियों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ा देते हैं:
- प्रबल सक्रियक (+R): −OH, −NH2, −NHR, −O−
- मध्यम सक्रियक: −OCH3, −NHCOCH3
- दुर्बल सक्रियक (+I, अतिसंयुग्मन): −CH3, −C2H5
मेटा दिष्टकारी निष्क्रियक समूह
वे समूह जो −R तथा −I प्रभाव द्वारा वलय से इलेक्ट्रॉन आकर्षित करते हैं (विशेष रूप से ऑर्थो तथा पैरा स्थितियों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व न्यूनतम कर देते हैं):
- प्रबल निष्क्रियक: −NO2, −NR3+, −CF3, −CCl3
- मध्यम निष्क्रियक: −CN, −SO3H, −CHO, −COOH
हैलोजनों का असामान्य व्यवहार (−F, −Cl, −Br, −I)
हैलोजन परमाणुओं का −I प्रभाव (विद्युत-ऋणात्मकता) उनके +R अनुनाद प्रभाव से अधिक प्रबल होता है। इसके कारण बेंजीन वलय से कुल इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है, अतः क्लोरोबेंजीन आदि बेंजीन की तुलना में कम क्रियाशील (निष्क्रियक) होते हैं। किंतु आक्रमण के समय ऑर्थो तथा पैरा आक्रमण से बनने वाले मध्यवर्ती में हैलोजन का एकाकी युग्म धन आवेश को साझा कर पूर्ण अष्टक वाली अतिरिक्त स्थायी अनुनादी संरचना बनाता है। अतः हैलोजन निष्क्रियक होते हुए भी ऑर्थो-पैरा दिष्टकारी होते हैं!
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