ऐल्कीन: संरचना, ज्यामितीय समावयवता एवं रासायनिक अभिक्रियाएं
ऐल्कीन असंतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं जिनमें कम से कम एक कार्बन-कार्बन द्वि-आबंध (C=C) उपस्थित होता है। इनका सामान्य सूत्र CnH2n है। ऐल्कीन के द्वि-आबंध में एक प्रबल σ-आबंध (sp2-sp2 सम्मुख अतिव्यापन) तथा एक दुर्बल π-आबंध (असंकरित 2p कक्षकों के पाश्विक अतिव्यापन) से निर्मित होता है।
1. ज्यामितीय समावयवता (Geometrical Isomerism)
C=C द्वि-आबंध के चारों ओर घूर्णन प्रतिबंधित (restricted/hindered rotation) होने के कारण जब द्वि-आबंधित प्रत्येक कार्बन पर दो भिन्न समूह जुड़े होते हैं, तो ज्यामितीय समावयवता उत्पन्न होती है:
समपक्ष समावयवी (Cis-Isomer)
जब दो समान परमाणु या समूह द्वि-आबंध के एक ही ओर स्थित होते हैं:
- ध्रुवीयता: उच्च द्विध्रुव आघूर्ण (μ > 0) क्योंकि दोनों C–CH3 आघूर्ण एक दिशा में जुड़ते हैं।
- क्वथनांक (Boiling Point): अधिक ध्रुवीय होने के कारण अंतराण्विक आकर्षण प्रबल होता है, अतः क्वथनांक अधिक होता है।
- गलनांक (Melting Point): कम सममित होने के कारण क्रिस्टल जालक में संकुलन दुर्बल होता है, अतः गलनांक कम होता है।
विपक्ष समावयवी (Trans-Isomer)
जब दो समान परमाणु या समूह द्वि-आबंध के विपरीत ओर स्थित होते हैं:
- ध्रुवीयता: शून्य या अति न्यून द्विध्रुव आघूर्ण (μ ≈ 0) क्योंकि समूह एक-दूसरे के प्रभाव को निरस्त कर देते हैं।
- क्वथनांक: दुर्बल द्विध्रुव-द्विध्रुव आकर्षण के कारण समपक्ष की तुलना में कम होता है।
- गलनांक: उच्च सममिति के कारण क्रिस्टल जालक में उत्तम संकुलन (packing) होता है, अतः गलनांक काफी अधिक होता है।
2. ऐल्कीनों के विरचन की विधियां
A. ऐल्काइन के नियंत्रित अपचयन द्वारा
1. समपक्ष-ऐल्कीन (Cis): लिंडलार उत्प्रेरक (पैलेडियम युक्त BaSO4 या CaCO3, जिसे क्विनोलिन या सल्फर द्वारा आंशिक विषैला किया गया हो) की उपस्थिति में H2 के सिन-योग द्वारा समपक्ष ऐल्कीन प्राप्त होती है:
2. विपक्ष-ऐल्कीन (Trans): विलेय-धातु अपचयन (द्रव अमोनिया में सोडियम, Na / liq. NH3) द्वारा ऐंटी-योग होकर विपक्ष ऐल्कीन प्राप्त होती है:
B. ऐल्किल हैलाइडों के विहाइड्रोहैलोजनीकरण द्वारा
ऐल्किल हैलाइड को ऐल्कोहॉली KOH के साथ गर्म करने पर β-विलोपन अभिक्रिया द्वारा ऐल्कीन प्राप्त होती है। यह अभिक्रिया सेत्ज़ेफ नियम (Saytzeff's Rule) का पालन करती है:
ब्यूट-2-ईन (80%, मुख्य उत्पाद) + ब्यूट-1-ईन (20%, गौण)
सेत्ज़ेफ नियम: विलोपन अभिक्रिया में वह ऐल्कीन मुख्य उत्पाद बनती है जिसमें द्वि-आबंधित कार्बनों पर ऐल्किल प्रतिस्थापियों की संख्या अधिक होती है (अतिसंयुग्मन स्थायित्व)।
3. ऐल्कीनों की महत्वपूर्ण योग अभिक्रियाएं
मार्कोवनीकॉव नियम बनाम खराश परॉक्साइड प्रभाव
1. मार्कोवनीकॉव योग (आयनिक क्रियाविधि)
असममित ऐल्कीन पर HX (HCl, HBr, HI) के योग में इलेक्ट्रोफाइल H+ पहले जुड़कर अधिक स्थायी 2° या 3° कार्बधनायन बनाता है:
(2-ब्रोमोप्रोपेन – मुख्य उत्पाद)
2. खराश प्रभाव (मुक्त मूलक क्रियाविधि)
कार्बनिक परॉक्साइड (जैसे बेंजॉयल परॉक्साइड) की उपस्थिति में केवल HBr ऐंटी-मार्कोवनीकॉव उत्पाद देता है:
(1-ब्रोमोप्रोपेन – मुख्य उत्पाद)
C. ओजोनी-अपघटन (Ozonolysis)
ऐल्कीन ओजोन से क्रिया कर ओजोनाइड बनाती है, जिसका Zn चूर्ण एवं जल द्वारा अपचयन कराने पर C=C आबंध विखंडित होकर कार्बोनिल यौगिक (ऐल्डिहाइड या कीटोन) देता है:
यह अभिक्रिया ऐल्कीनों में द्वि-आबंध की स्थिति ज्ञात करने के लिए एक अत्यंत उपयोगी परीक्षण है।
D. बायर अभिकर्मक द्वारा ऑक्सीकरण
शीत, तनु, क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट विलयन (बायर अभिकर्मक) ऐल्कीन को विसिनल ग्लाइकॉल (सिन-डाइऑल) में ऑक्सीकृत कर देता है, जिससे बैंगनी रंग लुप्त हो जाता है और भूरा अवक्षेप (MnO2) प्राप्त होता है:
यह असंतृप्तता की पहचान का एक क्लासिक प्रयोगशाला परीक्षण है।
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