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कक्षा 11 · रसायन विज्ञानJEE MAIN × NEETEnglish
§ 9.1NCERT कक्षा 11 · रसायन विज्ञान · अध्याय 9

ऐल्केन: नामपद्धति, विरचन, रासायनिक अभिक्रियाएं एवं संरूपण

ऐल्केन संतृप्त विवृत-शृंखला (अचक्रीय) हाइड्रोकार्बन हैं जिनका सामान्य सूत्र CnH2n+2 होता है। इनमें कार्बन-कार्बन एकल आबंध (σ-आबंध) उपस्थित होते हैं तथा प्रत्येक कार्बन परमाणु sp3 संकरित (चतुष्फलकीय ज्यामिति, 109.5° आबंध कोण) होता है। सामान्य परिस्थितियों में अम्ल, क्षार तथा अन्य अभिकर्मकों के प्रति अक्रिय होने के कारण इन्हें ऐतिहासिक रूप से पैराफिन (लैटिन: parum affinis = अल्प क्रियाशील) भी कहा जाता है।

1. ऐल्केनों के विरचन की विधियां (Methods of Preparation)

A. असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों के हाइड्रोजनीकरण द्वारा (सबात्ये-सेंदरांस अभिक्रिया)

सूक्ष्म विभाजित उत्प्रेरक (Ni, Pt या Pd) की उपस्थिति में ऐल्कीन अथवा ऐल्काइन पर डाइहाइड्रोजन गैस प्रवाहित करने पर ऐल्केन प्राप्त होते हैं:

CH2=CH2 + H2 → (Ni, 523–573 K या Pt/Pd, 298 K) → CH3–CH3

यह अभिक्रिया सिन-योग (syn-addition) द्वारा संपन्न होती है।

B. ऐल्किल हैलाइडों के अपचयन द्वारा

ऐल्किल हैलाइड (फ्लुओराइडों को छोड़कर) जिंक एवं तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (Zn + HCl) द्वारा अपचयित होकर ऐल्केन बनाते हैं:

CH3–Cl + H2 → (Zn / H+) → CH4 + HCl

CH3CH2Cl + 2[H] → (Zn + dil. HCl) → CH3CH3 + HCl

C. वुर्ट्ज़ अभिक्रिया (Wurtz Reaction)

शुष्क ईथर की उपस्थिति में ऐल्किल हैलाइडों की सोडियम धातु से क्रिया कराने पर उच्चतर सममित ऐल्केन (सम संख्या में कार्बन) प्राप्त होते हैं:

2 R–X + 2 Na → (शुष्क ईथर) → R–R + 2 NaX

उदाहरण: 2 CH3Br + 2 Na → C2H6 (एथेन) + 2 NaBr

जेईई/नीट के लिए महत्वपूर्ण सीमाएं:
  • मेथेन (CH4) का विरचन इस विधि द्वारा संभव नहीं है।
  • दो भिन्न ऐल्किल हैलाइडों (R-X + R'-X) के प्रयोग पर तीन भिन्न ऐल्केनों (R-R, R-R', R'-R') का मिश्रण मिलता है, जिसे पृथक करना अत्यंत जटिल होता है।
  • तृतीयक ऐल्किल हैलाइड मुख्य रूप से विलोपन द्वारा ऐल्कीन बनाते हैं।

D. कार्बोक्सिलिक अम्लों से (Decarboxylation & Kolbe)

1. सोडालाइम द्वारा वि-कार्बोक्सिलीकरण: कार्बोक्सिलिक अम्ल के सोडियम लवण को सोडालाइम (NaOH + CaO, 3:1 अनुपात) के साथ गर्म करने पर मूल अम्ल से एक कम कार्बन वाला ऐल्केन प्राप्त होता है:

CH3COONa + NaOH → (CaO, Δ) → CH4 ↑ + Na2CO3

2. कोल्बे की वैद्युतअपघटनी विधि: सोडियम या पोटैशियम कार्बोक्सिलेट के जलीय विलयन के विद्युत-अपघटन पर एनोड पर सममित ऐल्केन एवं CO2 मुक्त होती है, जबकि कैथोड पर H2 गैस निकलती है:

एनोड पर: 2 CH3COO− → C2H6 + 2 CO2 + 2 e−
कैथोड पर: 2 H2O + 2 e− → H2 + 2 OH−

2. ऐल्केनों के रासायनिक गुणधर्म

A. मुक्त मूलक हैलोजनन (Free Radical Halogenation)

पराबैंगनी प्रकाश (hν) या उच्च ताप (573–773 K) पर ऐल्केन हैलोजन से क्रिया कर प्रतिस्थापन उत्पाद बनाते हैं:

CH4 + Cl2 → (hν) → CH3Cl → CH2Cl2 → CHCl3 → CCl4

क्रियाविधि के तीन पद:

  1. शृंखला प्रारंभन पद (Initiation): Cl2 → (hν) → 2 Cl• (समांगी विखंडन)
  2. शृंखला संचरण पद (Propagation):
    (i) Cl• + CH4 → •CH3 + HCl
    (ii) •CH3 + Cl2 → CH3Cl + Cl•
  3. शृंखला समापन पद (Termination): मूलकों का युग्मन, जैसे Cl• + Cl• → Cl2, •CH3 + Cl• → CH3Cl, एवं •CH3 + •CH3 → CH3CH3 (एथेन के सूक्ष्म अंश की उत्पत्ति)।

हैलोजनन में H-परमाणु के प्रतिस्थापन की सुगमता का क्रम: 3° > 2° > 1° (मुक्त मूलक के आपेक्षिक स्थायित्व के अनुसार)। हैलोजनों की क्रियाशीलता: F2 > Cl2 > Br2 > I2।

B. समावयवीकरण (Isomerisation)

सीधी शृंखला वाले ऐल्केन निर्जल AlCl3 एवं HCl गैस की उपस्थिति में गर्म करने पर शाखित शृंखला वाले समावयवियों में रूपांतरित हो जाते हैं:

CH3(CH2)4CH3 → (निर्जल AlCl3 / HCl, Δ) → 2-मेथिलपेन्टेन + 3-मेथिलपेन्टेन

C. एरोमैटीकरण (Aromatisation)

6 या अधिक कार्बन वाले n-ऐल्केन Cr2O3, V2O5 या Mo2O3 उत्प्रेरक पर 773 K एवं 10–20 वायुमंडलीय दाब पर विहाइड्रोजनीकृत एवं चक्रीयकृत होकर ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन बनाते हैं:

n-हेक्सेन (C6H14) → (Cr2O3/Al2O3, 773 K, 10–20 atm) → बेंजीन (C6H6) + 4 H2

n-हेप्टेन इसी प्रकार टॉलूईन (C6H5CH3) देता है।

3. एथेन के संरूपण (Conformations of Ethane)

कार्बन-कार्बन एकल आबंध (σ-आबंध) के चारों ओर मुक्त घूर्णन (free rotation) के कारण परमाणुओं की अंतरिक्ष में विभिन्न व्यवस्थाएं संभव हैं, जिन्हें संरूपण (Conformations / Conformers) अथवा घूर्णी समावयवी (Rotamers) कहा जाता है।

सांतरीत संरूपण (Staggered Conformation)

  • दोनों कार्बन परमाणुओं के C-H आबंधों के मध्य द्वितल कोण (dihedral angle, θ) 60° होता है।
  • C-H आबंधी इलेक्ट्रॉन युग्म अंतरिक्ष में एक-दूसरे से अधिकतम दूरी पर होते हैं।
  • मरोड़ी विकृति (Torsional strain) न्यूनतम होती है।
  • स्थितिज ऊर्जा न्यूनतम तथा स्थायित्व अधिकतम होता है।

ग्रस्त संरूपण (Eclipsed Conformation)

  • द्वितल कोण (θ) 0° होता है (एक कार्बन के H परमाणु दूसरे कार्बन के H परमाणुओं को पूर्णतः ढक लेते हैं)।
  • C-H आबंधी इलेक्ट्रॉन युग्म न्यूनतम दूरी पर आ जाते हैं।
  • तीव्र इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण (मरोड़ी विकृति ≈ 12.5 kJ mol−1) उत्पन्न होता है।
  • स्थितिज ऊर्जा अधिकतम तथा स्थायित्व न्यूनतम होता है।
संरूपणीय समावयवता का सारांश:

सांतरीत एवं ग्रस्त संरूपणों के मध्य ऊर्जा अवरोध केवल 12.5 kJ mol−1 (3 kcal mol−1) होता है। कक्ष ताप पर अणुओं की तापीय ऊर्जा (kT) इस ऊर्जा अवरोध को पार करने के लिए पर्याप्त होती है, अतः एथेन के संरूपण एक-दूसरे में तीव्र गति से अंतःपरिवर्तित होते रहते हैं और इन्हें सामान्य परिस्थितियों में पृथक नहीं किया जा सकता।

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