तापीय विकिरण एवं न्यूटन का शीतलन नियम – संपूर्ण मार्गदर्शिका
चालन और संवहन के विपरीत, तापीय विकिरण (Thermal Radiation) को संचरण हेतु किसी भौतिक माध्यम की आवश्यकता नहीं होती। यह विद्युत चुंबकीय तरंगों (मुख्यतः अवरक्त स्पेक्ट्रम) के रूप में प्रकाश की चाल (c = 3 × 108 m/s) से निर्वात में भी संचरित होता है। परम शून्य से अधिक ताप (T > 0 K) पर स्थित प्रत्येक पिंड निरंतर तापीय विकिरण उत्सर्जित करता है।
1. विकिरण संबंधी आधारभूत परिभाषाएं एवं किरचॉफ का नियम
- उत्सर्जन क्षमता (e): किसी पिंड के एकांक क्षेत्रफल से प्रति सेकंड उत्सर्जित होने वाली कुल विकिरण ऊर्जा।
- अवशोषण क्षमता (a): पिंड द्वारा अवशोषित विकिरण ऊर्जा तथा उस पर आपतित कुल विकिरण ऊर्जा का अनुपात (a ≤ 1)।
- आदर्श कृष्णिका (Blackbody): वह पिंड जो अपने ऊपर आपतित सभी तरंगदैर्घ्यों के विकिरणों को पूर्णतः (100%) अवशोषित कर लेता है (a = 1)। गर्म करने पर यह उसी ताप पर अधिकतम संभव विकिरण उत्सर्जित करता है।
किरचॉफ का विकिरण नियम (Kirchhoff's Law of Radiation)
“किसी दिए गए ताप पर सभी पिंडों के लिए उत्सर्जन क्षमता एवं अवशोषण क्षमता का अनुपात एकसमान रहता है तथा उस ताप पर एक आदर्श कृष्णिका की उत्सर्जन क्षमता के बराबर होता है।”
महत्वपूर्ण निष्कर्ष: “अच्छे अवशोषक ही अच्छे उत्सर्जक होते हैं; बुरे अवशोषक बुरे उत्सर्जक होते हैं।” सौर स्पेक्ट्रम में फ्रॉनहॉफर की काली अवशोषण रेखाएं इसी नियम से समझाई जाती हैं।
2. स्टीफन-बोल्ट्ज़मान का नियम
किसी आदर्श कृष्णिका के प्रति एकांक क्षेत्रफल से प्रति सेकंड उत्सर्जित कुल विकिरण ऊर्जा उसके परम ताप के चतुर्थ घात के अनुक्रमानुपाती होती है:
वास्तविक पिंड का उत्सर्जन (उत्सर्जकता e)
A पृष्ठीय क्षेत्रफल तथा e उत्सर्जकता (0 < e < 1) वाले पिंड हेतु:
परिवेश में शुद्ध विकिरण हानि दर
यदि T ताप का पिंड T0 ताप के परिवेश में स्थित हो:
3. वीन का विस्थापन नियम (Wien's Displacement Law)
जैसे-जैसे कृष्णिका का ताप T बढ़ता है, उत्सर्जित कुल ऊर्जा अत्यधिक बढ़ती है तथा अधिकतम उत्सर्जन क्षमता वाली तरंगदैर्घ्य (λm) छोटी तरंगदैर्घ्य की ओर खिसकती जाती है।
λm × T = b ≈ 2.898 × 10−3 m K
वीन के नियम के अनुप्रयोग
- तारों का ताप निर्धारण: सूर्य के प्रकाश के लिए λm ≈ 490 nm मापने पर सूर्य के पृष्ठ का ताप: Tसूर्य = (2.898 × 10−3) / (490 × 10−9) ≈ 5900 K प्राप्त होता है।
- लोहे को गर्म करने पर रंग परिवर्तन: मंद लाल (∼ 700 °C) → चमकीला लाल → पीला → श्वेत-तप्त (> 1200 °C)।
4. न्यूटन का शीतलन नियम (Newton's Law of Cooling)
जब कोई तप्त पिंड T0 ताप के शांत परिवेश में ठंडा होता है, तो अल्प तापांतर (ΔT = T − T0 ≪ T0) के लिए ऊष्मा हानि की दर तापांतर के अनुक्रमानुपाती होती है:
dQ / dt = − K' (T − T0) ⇒ − dT / dt = K (T − T0)
क. समाकलित / चरघातांकी रूप
समाकलन करने पर:
T(t) − T0 = (Tप्रारंभिक − T0) e− K t
ln(T − T0) तथा समय t के बीच ग्राफ −K ढाल वाली सरल रेखा होता है।
ख. सन्निकट औसत विधि (JEE / NEET प्रश्न हल करने हेतु)
t समय में T1 से T2 तक ठंडा होने पर:
यह रैखिक औसत विधि संख्यात्मक प्रश्नों में अत्यंत तीव्र एवं सटीक परिणाम देती है।
Pnet = e σ A (T4 − T04)।
माना T = T0 + ΔT। द्विपद प्रमेय से: T4 = T04(1 + ΔT/T0)4 ≈ T04(1 + 4 ΔT/T0)।
⇒ T4 − T04 ≈ 4 T03 ΔT।
अतः dQ/dt ≈ (4 e σ A T03) (T − T0) ∝ (T − T0)।
यह सिद्ध करता है कि अल्प तापांतर पर न्यूटन का शीतलन नियम वास्तव में स्टीफन के विकिरण नियम का प्रथम-कोटि रैखिक सन्निकटन है।
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