ऊष्मा स्थानांतरण: चालन एवं संवहन – JEE एवं NEET मार्गदर्शिका
ऊष्मा ऊर्जा का स्वतः प्रवाह उच्च ताप वाले क्षेत्र से निम्न ताप वाले क्षेत्र की ओर तीन विधियों द्वारा होता है: चालन (Conduction), संवहन (Convection), तथा विकिरण (Radiation)। इस भाग में हम चालन और संवहन का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
1. ऊष्मा चालन एवं फूरियर का नियम
चालन ठोसों में ऊष्मा संचरण की वह विधि है जिसमें माध्यम के कण अपना स्थान छोड़े बिना केवल अपनी साम्य स्थिति के परितः कंपन करते हुए ऊर्जा अपने निकटवर्ती कणों को स्थानांतरित करते हैं (धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉनों द्वारा भी ऊर्जा का तीव्र संचरण होता है)।
फूरियर का ऊष्मा चालन नियम (Fourier's Law)
L लंबाई तथा A एकसमान अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल वाली छड़ के सिरों का ताप T1 तथा T2 (जहाँ T1 > T2) पर स्थिर रखा गया है। स्थायी अवस्था में ऊष्मा प्रवाह की दर:
जहाँ:
- H = dQ/dt: ऊष्मा धारा / ऊष्मा प्रवाह की दर (SI मात्रक: वाट (W) या J s−1)।
- k: पदार्थ की ऊष्मा चालकता (Thermal Conductivity) (SI मात्रक: W m−1 K−1 या J s−1 m−1 K−1)।
- dT/dx: ताप प्रवणता (दूरी के साथ ताप परिवर्तन की दर, K m−1)।
| पदार्थ | ऊष्मा चालकता k (W m−1 K−1) | वर्गीकरण |
|---|---|---|
| हीरा (Diamond) | ~ 2300 | सर्वोत्कृष्ट चालक (दृढ़ जालक कंपन) |
| चांदी (Silver) | 406 | धातुओं में सर्वोत्तम चालक |
| तांबा (Copper) | 385 | उत्कृष्ट सुचालक |
| एल्युमिनियम | 205 | सुचालक |
| कांच / कंक्रीट | 0.8 – 1.2 | मध्यम कुचालक |
| लकड़ी | 0.12 | ऊष्मा का अच्छा कुचालक |
| स्थिर वायु | 0.026 | उत्कृष्ट ऊष्मारोधी (ऊनी वस्त्रों में फंसी वायु) |
2. ऊष्मा चालन की वैद्युत सादृश्यता (Electrical Analogy)
प्रत्यक्ष सादृश्य राशियां
- तापांतर (ΔT): विभवांतर (ΔV) के समतुल्य।
- ऊष्मा धारा (H = dQ/dt): विद्युत धारा (I = dq/dt) के समतुल्य।
- तापीय प्रतिरोध (Rth): वैद्युत प्रतिरोध (Re) के समतुल्य।
तापीय प्रतिरोध का सूत्र
SI मात्रक: K W−1
जिस प्रकार वैद्युत प्रतिरोध R = L / (σ A) होता है, उसी प्रकार तापीय प्रतिरोध लंबाई L के अनुक्रमानुपाती तथा चालकता k व क्षेत्रफल A के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
3. संयुक्त पट्टियों का संयोजन (JEE / NEET महत्वपूर्ण प्रश्न)
क. श्रेणी संयोजन (Series Combination)
दोनों पट्टियों से समान ऊष्मा धारा H प्रवाहित होती है:
संपर्क तल का ताप (T0):
T0 = (k1 T1 / L1 + k2 T2 / L2) / (k1/L1 + k2/L2)
ख. समांतर संयोजन (Parallel Combination)
दोनों पट्टियों के सिरों का तापांतर समान; कुल धारा H = H1 + H2:
तुल्य ऊष्मा चालकता:
keq = (k1 A1 + k2 A2) / (A1 + A2)
4. संवहन (Convection): प्राकृतिक बनाम प्रणोदित
संवहन तरलों (द्रवों एवं गैसों) में ऊष्मा स्थानांतरण की वह विधि है जिसमें माध्यम के गर्म कण स्वयं गति करके ऊष्मा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं। यह ठोसों में या निर्वात में संभव नहीं है।
प्राकृतिक (मुक्त) संवहन
तरल की गति ताप के कारण घनत्व में परिवर्तन से उत्पन्न उत्प्लावन बलों द्वारा होती है (इसके लिए गुरुत्वाकर्षण आवश्यक है):
- जल समीर (दिन में): भूमि समुद्र की अपेक्षा शीघ्र गर्म होती है; भूमि की वायु ऊपर उठती है और समुद्र की ठंडी वायु स्थल की ओर बहती है।
- थल समीर (रात में): भूमि शीघ्र ठंडी हो जाती है; समुद्र का जल अपेक्षाकृत गर्म रहता है, अतः स्थल से ठंडी वायु समुद्र की ओर बहती है।
- व्यापारिक पवनें (Trade Winds): विषुवत रेखा पर गर्म वायु के ऊपर उठने से उत्पन्न संवहन धाराएं।
प्रणोदित संवहन
तरल को किसी बाह्य यांत्रिक युक्ति जैसे पंखे, पंप अथवा ब्लोअर द्वारा गति प्रदान की जाती है:
- हृदय द्वारा रक्त परिसंचरण: हृदय द्वारा पंप किया गया रक्त शरीर के अंगों की ऊष्मा को त्वचा तक पहुंचाकर निष्कासित कराता है।
- वाहनों के रेडिएटर: पानी को पंप द्वारा इंजन के चारों ओर घुमाकर अतिरिक्त ऊष्मा बाहर निकाली जाती है।
- कंप्यूटर सीपीयू कूलिंग फैन: पंखे द्वारा हवा को तीव्र गति से प्रवाहित कर प्रोसेसर को ठंडा रखा जाता है।
केवल इसी डिवाइस पर सेव — कोई अकाउंट या साइन-इन नहीं।