हुक का नियम एवं प्रतिबल-विकृति वक्र
किसी ठोस पदार्थ पर जब क्रमिक रूप से तनन भार लगाया जाता है, तो उसका यांत्रिक व्यवहार इंजीनियरिंग डिजाइन, संरचनात्मक सुरक्षा एवं सामग्री चयन का आधार बनता है। इस मॉड्यूल में हम हुक के नियम, तन्य धातुओं के संपूर्ण प्रतिबल-विकृति आरेख, स्थायी विरूपण, तन्य बनाम भंगुर पदार्थों तथा रबर में प्रत्यास्थ शैथिल्य का गहन विश्लेषण करेंगे।
1. हुक का नियम: प्रतिपादन एवं वैधता क्षेत्र
सन् 1676 में अंग्रेज वैज्ञानिक रॉबर्ट हुक ने प्रत्यास्थ विरूपणों के मूलभूत आनुपातिक संबंध की खोज की। प्रायोगिक रूप से जब धातु के तार पर धीरे-धीरे भार बढ़ाया जाता है, तो एक निश्चित सीमा तक लंबाई में वृद्धि आरोपित बल के अनुक्रमानुपाती होती है।
यहां समानुपाती नियतांक E को पदार्थ का प्रत्यास्थता गुणांक (Modulus of Elasticity) कहते हैं। इसका मात्रक N/m² अथवा पास्कल (Pa) तथा विमीय सूत्र [M L⁻¹ T⁻²] होता है।
2. प्रतिबल-विकृति वक्र का पूर्ण क्षेत्रीय विश्लेषण
धातु के यांत्रिक गुणों का निर्धारण करने के लिए मानक नमूने (जैसे निश्चित लंबाई व व्यास की बेलनाकार छड़) को यूनिवर्सल टेस्टिंग मशीन (UTM) में खींचकर प्रतिबल एवं विकृति का आलेख खींचा जाता है।
वक्र के विभिन्न क्षेत्रों का सविस्तार विश्लेषण:
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क्षेत्र OA (रैखिक प्रत्यास्थ क्षेत्र / हुक का नियम):
मूल बिंदु O से बिंदु A तक प्रतिबल, विकृति के अनुक्रमानुपाती होता है (σ = Y ε)। ग्राफ एक सरल रेखा है। बिंदु A को आनुपातिकता सीमा (Proportional Limit) कहते हैं। OA की ढाल सीधे यंग गुणांक (Y) के बराबर होती है। यदि भार हटा लिया जाए, तो तार बिना किसी अवशिष्ट विकृति के पुनः बिंदु O पर लौट आता है। -
क्षेत्र AB (अरैखिक प्रत्यास्थ क्षेत्र):
A से B के बीच प्रतिबल और विकृति अनुक्रमानुपाती नहीं रहते, फिर भी विरूपण पूर्णतः प्रत्यास्थ होता है। बिंदु B को प्रत्यास्थ सीमा (Elastic Limit) अथवा पराभव बिंदु (Yield Point) कहते हैं। इस बिंदु पर प्रतिबल को पराभव सामर्थ्य (σ_y या S_y) कहा जाता है। B पर भार हटाने पर वस्तु अपनी मूल लंबाई प्राप्त कर लेती है। -
क्षेत्र BC (प्लास्टिक विरूपण का आरंभ):
बिंदु B से आगे प्रतिबल में अल्प वृद्धि करने पर भी विकृति में तीव्र वृद्धि होती है। यदि बिंदु C पर भार हटा लिया जाए, तो पदार्थ मूल वक्र का अनुसरण नहीं करता, बल्कि OA के समांतर एक रेखा के अनुदिश संकुचित होता है। इससे पदार्थ में स्थायी विरूपण (Permanent Set, OO') रह जाता है, जो सामान्यतः 1% से कम होता है। -
क्षेत्र CD (सुघट्य प्रवाह एवं चरम सामर्थ्य):
बिंदु C से आगे क्रिस्टल जालक में विस्थापनों (Dislocations) के खिसकने से वृहद प्लास्टिक प्रवाह होता है। बिंदु D वक्र का उच्चतम बिंदु है, जिसे चरम तनन सामर्थ्य (Ultimate Tensile Strength, σ_u या S_u) कहते हैं। यह वह अधिकतम प्रतिबल है जिसे पदार्थ बिना टूटे सहन कर सकता है। -
क्षेत्र DE (संकीर्णन एवं विभंजन):
बिंदु D से आगे नमूने के किसी एक स्थान पर अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल तेजी से घटने लगता है, जिसे संकीर्णन (Necking) कहते हैं। इसके बाद यदि आरोपित बल को कम भी कर दिया जाए, तो भी संकीर्ण भाग पर प्रतिबल बढ़ता रहता है और अंततः बिंदु E पर नमूना टूट जाता है। बिंदु E को विभंजन बिंदु (Fracture / Breaking Point) कहते हैं।
3. प्रतिबल-विकृति वक्र के आधार पर पदार्थों का वर्गीकरण
1. तन्य पदार्थ (Ductile Materials)
वे पदार्थ जिनमें पराभव बिंदु (B) तथा विभंजन बिंदु (E) के मध्य प्लास्टिक विरूपण का एक लंबा क्षेत्र होता है। इन्हें बिना टूटे पतले तारों में खींचा अथवा चद्दरों में ढाला जा सकता है।
उदाहरण: तांबा, एल्युमिनियम, मृदु इस्पात, सोना, चांदी।
2. भंगुर पदार्थ (Brittle Materials)
वे पदार्थ जिनमें विभंजन बिंदु (E), प्रत्यास्थ सीमा (B) के अत्यंत निकट होता है। इनमें कोई प्लास्टिक क्षेत्र नहीं होता; ये बिना संकीर्णन के अचानक टूट जाते हैं।
उदाहरण: कांच, ढलवां लोहा, चीनी मिट्टी (सिरेमिक), उच्च-कार्बन इस्पात।
4. प्रत्यास्थलक (Elastomers) एवं प्रत्यास्थ शैथिल्य
कुछ पदार्थ हुक के नियम का लगभग बिल्कुल पालन नहीं करते, फिर भी उन्हें खींचकर उनकी मूल लंबाई से कई गुना अधिक विकृत किया जा सकता है तथा भार हटाने पर वे वापस अपनी स्थिति में आ जाते हैं। ऐसे पदार्थों को प्रत्यास्थलक (Elastomers) कहते हैं (जैसे वल्कनीकृत रबर, महाधमनी का ऊतक)।
- रबर में संकुचन (भार-मुक्ति) के दौरान किसी दी गई विकृति हेतु आवश्यक प्रतिबल, भारण के समय के प्रतिबल से कम होता है।
- खींचने में किया गया कार्य, सिकुड़ते समय प्राप्त कार्य से अधिक होता है। दोनों का अंतर—लूप का क्षेत्रफल—पदार्थ के भीतर आंतरिक ऊष्मा में परिवर्तित हो जाता है।
- गाड़ियों के टायर तथा कंपन रोधी पैड (Shock Absorbers) उच्च शैथिल्य वाले रबर से बनाए जाते हैं ताकि वे झटकों की यांत्रिक ऊर्जा को अवशोषित कर ऊष्मा के रूप में विसरित कर सकें।
5. हल किए गए उदाहरण एवं संख्यात्मक अनुप्रयोग
चरण 1: यंग प्रत्यास्थता गुणांक की तुलना:
यंग गुणांक Y = रैखिक प्रत्यास्थ क्षेत्र OA की ढाल = Δσ / Δε। चूंकि वक्र A की प्रारंभिक ढाल B से अधिक है, अतः पदार्थ A का यंग गुणांक पदार्थ B से अधिक है (Y_A > Y_B)।
चरण 2: तन्यता एवं संरचनात्मक उपयुक्तता:
पदार्थ A में पराभव बिंदु और विभंजन बिंदु के मध्य वृहद दूरी है, अतः यह तन्य (Ductile) है और टूटने से पहले खिंचकर पूर्व चेतावनी देता है।
पदार्थ B में कोई प्लास्टिक क्षेत्र नहीं है, अतः यह भंगुर (Brittle) है और अचानक टूट जाएगा।
अतः पुलों और क्रेन केबल हेतु पदार्थ A का चयन किया जाता है।
चरण 1: पराभव सामर्थ्य तथा प्रत्यास्थ सीमा का संबंध:
स्थायी विरूपण से बचने हेतु प्रतिबल का मान पराभव सामर्थ्य σ_y से अधिक नहीं होना चाहिए।
σ_max = σ_y = 2.5 × 10⁸ N/m²।
चरण 2: अधिकतम अनुमेय बल की गणना:
क्षेत्रफल A = 2.0 mm² = 2.0 × 10⁻⁶ m²।
F_max = σ_max × A = (2.5 × 10⁸ N/m²) × (2.0 × 10⁻⁶ m²) = 500 N।
चरण 3: अधिकतम लटकाया जाने वाला द्रव्यमान:
M_max = F_max / g = 500 N / 9.8 m/s² = 51.02 किग्रा।
चरण 1: अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल की गणना:
व्यास d = 12.5 मिमी = 1.25 × 10⁻² मीटर ⇒ त्रिज्या r = 6.25 × 10⁻³ मीटर।
क्षेत्रफल A = π r² = 3.1416 × (6.25 × 10⁻³)² = 1.227 × 10⁻⁴ m²।
चरण 2: आनुपातिकता सीमा प्रतिबल (σ_p):
σ_p = F_p / A = (38.0 × 10³ N) / (1.227 × 10⁻⁴ m²) = 3.10 × 10⁸ N/m² (310 MPa)।
चरण 3: चरम तनन सामर्थ्य (σ_u):
σ_u = F_max / A = (68.0 × 10³ N) / (1.227 × 10⁻⁴ m²) = 5.54 × 10⁸ N/m² (554 MPa)।
चरण 1: प्रति एकांक आयतन क्षयित ऊर्जा:
प्रति चक्र प्रति एकांक आयतन ऊर्जा क्षय = 250 J/m³।
100 चक्रों में कुल आयतनी ऊष्मा q_v = 100 × 250 J/m³ = 25,000 J/m³।
चरण 2: प्रति द्रव्यमान कुल ऊष्मा Q की गणना:
ब्लॉक का आयतन V = M / ρ = 1.0 kg / (1.2 × 10³ kg/m³) = (1 / 1200) m³।
कुल ऊष्मा Q = q_v × V = 25,000 × (1 / 1200) = 20.83 जूल।
चरण 3: तापांतर ΔT की गणना:
Q = m × c × ΔT ⇒ ΔT = Q / (m × c) = 20.83 / (1.0 × 1600) = 0.013 °C।
(उच्च गति वाले वाहनों में लाखों चक्र होने पर टायरों का तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
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