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कक्षा 11 · भौतिकीJEE MAIN × NEETEnglish
§ 7.4NCERT कक्षा 11 · भौतिकी · अध्याय 7

उपग्रह की गति, कक्षीय वेग, ऊर्जा एवं उपग्रहों के प्रकार

उपग्रह वह प्राकृतिक अथवा कृत्रिम आकाशीय पिंड है जो किसी ग्रह के चारों ओर एक निश्चित कक्षा में गुरुत्वाकर्षण बल के अधीन परिक्रमण करता है। उपग्रहों की गतिज, स्थितिज एवं कुल यांत्रिक ऊर्जा तथा भू-स्थिर (Geostationary) और ध्रुवीय (Polar) कक्षाओं का अध्ययन खगोलीय भौतिकी तथा उपग्रह संचार का आधार है।

1. कक्षीय वेग (Orbital Velocity, vo) एवं परिक्रमण काल

माना m द्रव्यमान का कोई उपग्रह पृथ्वी (द्रव्यमान M, त्रिज्या R) के चारों ओर सतह से h ऊंचाई पर r = R + h त्रिज्या की वृत्ताकार कक्षा में चक्कर लगा रहा है। आवश्यक अभिकेंद्री बल गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा प्राप्त होता है:

m vo2 / r = G M m / r2

vo = √(G M / r) = √[G M / (R + h)] = R √[g / (R + h)]

पृथ्वी की सतह के निकट कक्षीय चाल (h ≪ R)

जब उपग्रह पृथ्वी की सतह के अत्यंत निकट चक्कर लगाता है (h ≈ 0, r ≈ R):

vo = √(g R) = √(9.8 × 6.4 × 106) ≈ 7.92 किमी/से ≈ 8 किमी/से

कक्षीय वेग और पलायन चाल में संबंध

ve = √(2 g R) = √2 vo ≈ 1.414 vo
यदि किसी परिक्रमण करते उपग्रह की चाल में 41.4% की वृद्धि कर दी जाए (Δv / vo = √2 − 1 ≈ 0.414), तो उसकी कुल ऊर्जा शून्य हो जाएगी और वह परवलयाकार मार्ग से अंतरिक्ष में पलायन कर जाएगा!

परिक्रमण काल (Period of Revolution, T)

उपग्रह द्वारा एक चक्कर पूर्ण करने में लगा समय:

T = 2πr / vo = 2π √[(R + h)3 / (G M)]

दोनों पक्षों का वर्ग करने पर: T2 ∝ r3 (केप्लर का तृतीय नियम)।

निकटवर्ती उपग्रह हेतु: T = 2π √(R / g) ≈ 84.6 मिनट ≈ 1.4 घंटे।

उपग्रह की ऊर्जा एवं कक्षाओं का वर्गीकरण

गतिज, स्थितिज एवं कुल ऊर्जा के परस्पर संबंध तथा भू-स्थिर बनाम ध्रुवीय कक्षाएं
कक्षीय ऊर्जा के परस्पर संबंध:
---------------------------
गतिज ऊर्जा (K)       = + G M m / (2r)   [सदा धनात्मक]
स्थितिज ऊर्जा (U)    = - G M m / r      [सदा ऋणात्मक, परिमाण K का दोगुना]
कुल ऊर्जा (E)        = - G M m / (2r)   [बद्ध कक्षा हेतु सदा ऋणात्मक]

मौलिक पहचान: E = -K = U / 2  <-->  बंधन ऊर्जा = -E = + G M m / (2r)

भू-स्थिर बनाम ध्रुवीय उपग्रह:
---------------------------
भू-स्थिर उपग्रह (संचार हेतु):                   ध्रुवीय उपग्रह (सुदूर संवेदन हेतु):
- कक्षा: विषुवतीय तल, पश्चिम से पूर्व          - कक्षा: उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों के ऊपर
- ऊंचाई h: लगभग 36,000 किमी                   - ऊंचाई h: लगभग 500 से 800 किमी
- आवर्तकाल T: ठीक 24 घंटे                      - आवर्तकाल T: लगभग 100 मिनट
- पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर प्रतीत होता है        - घूमती पृथ्वी की पट्टियों को स्कैन करता है
      
ऊर्जा संरक्षण का रोचक पहलू: यदि किसी उपग्रह पर वायुमंडलीय घर्षण का हल्का सा अवरोध लगे, तो उसकी कुल ऊर्जा E घटती है (अधिक ऋणात्मक होती है), जिससे उसकी त्रिज्या r घटती है और वह नीचे आता है। किंतु त्रिज्या घटने से उसकी कक्षीय चाल vo = √(GM/r) वस्तुतः बढ़ जाती है!

2. उपग्रह की ऊर्जा एवं बंधन ऊर्जा (Binding Energy)

ऊर्जा का प्रकार गणितीय व्यंजक चिह्न एवं परस्पर संबंध
गतिज ऊर्जा (K) K = ½ m vo2 = G M m / [2(R + h)] सदैव धनात्मक (+K)
स्थितिज ऊर्जा (U) U = −G M m / (R + h) ऋणात्मक (−2K)
कुल यांत्रिक ऊर्जा (E) E = K + U = −G M m / [2(R + h)] ऋणात्मक (−K = U/2)
बंधन ऊर्जा (B.E.) B.E. = −E = +G M m / [2(R + h)] उपग्रह को मुक्त करने हेतु आवश्यक कार्य
कुल ऊर्जा (E) के आधार पर प्रक्षेप्य का पथ:
  • E < 0: बद्ध कक्षा (वृत्ताकार यदि v = vo; दीर्घवृत्ताकार यदि vo < v < ve)।
  • E = 0: परवलयाकार (Parabolic) पथ पर पलायन करता है (v = ve)।
  • E > 0: अतिपरवलयाकार (Hyperbolic) पथ पर पलायन करता है (v > ve)।

3. भू-स्थिर बनाम ध्रुवीय उपग्रह

1. भू-स्थिर उपग्रह (Geostationary / Geosynchronous Satellite)

  • आवर्तकाल: पृथ्वी के घूर्णन काल के ठीक बराबर, T = 24 घंटे।
  • कक्षीय तल: अनिवार्य रूप से पृथ्वी के विषुवतीय तल (Equatorial plane) में स्थित।
  • परिक्रमण की दिशा: पश्चिम से पूर्व (पृथ्वी के घूर्णन की ही दिशा में)।
  • ऊंचाई (h): केप्लर के सूत्र में T = 24 घंटे रखने पर केंद्र से त्रिज्या r ≈ 42,200 किमी प्राप्त होती है। अतः सतह से ऊंचाई: h ≈ 35,800 किमी ≈ 36,000 किमी।
  • उपयोग: दूरसंचार, टेलीविज़न प्रसारण तथा मौसम पूर्वानुमान।

2. ध्रुवीय उपग्रह (Polar Satellite)

  • कक्षीय तल: उत्तर-दक्षिण दिशा में पृथ्वी के भौगोलिक ध्रुवों के ऊपर से गुजरने वाली कक्षा।
  • ऊंचाई (h): निम्न भू-कक्षा (LEO) में लगभग 500 से 800 किमी।
  • आवर्तकाल: लगभग 100 मिनट (दिन भर में पृथ्वी के अनेक हिस्सों का चक्कर लगाता है)।
  • उपयोग: उच्च-विभेदन सुदूर संवेदन (Remote sensing), पर्यावरण निगरानी, जासूसी एवं भू-मानचित्रण।

4. उपग्रह में भारहीनता (Weightlessness)

अंतरिक्ष यान के भीतर यात्री पूर्ण भारहीनता का अनुभव करते हैं। किसी वस्तु का आभासी भार संपर्क तल द्वारा उस पर लगाई गई अभिलंब प्रतिक्रिया N से मापा जाता है।

h ऊंचाई पर चक्कर लगाते उपग्रह में m द्रव्यमान के अंतरिक्ष यात्री हेतु गति का समीकरण:

Fg − N = m ac ⇒ m gh − N = m (vo2 / r)

चूँकि आवश्यक अभिकेंद्री त्वरण पूर्णतः गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा ही दिया जाता है (vo2 / r = gh):

m gh − N = m gh  ⇒  N = 0

क्योंकि उपग्रह और यात्री दोनों ही gh त्वरण से पृथ्वी की ओर निरंतर मुक्त रूप से गिर रहे हैं, अतः दोनों के मध्य कोई प्रतिक्रिया बल नहीं लगता। इस अवस्था को भारहीनता कहते हैं।

5. हल सहित JEE / NEET उच्च-प्राथमिकता अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1: यदि वृत्ताकार कक्षा में चक्कर लगाते उपग्रह की गतिज ऊर्जा E_k है, तो उसकी कुल यांत्रिक ऊर्जा क्या होगी?
(A) + E_k
(B) − E_k
(C) 2 E_k
(D) −2 E_k
उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) − E_k
चरणबद्ध हल:
1. r त्रिज्या की वृत्ताकार कक्षा में गतिज ऊर्जा K = +G M m / (2r) = Ek.
2. स्थितिज ऊर्जा U = −G M m / r = −2 Ek.
3. कुल यांत्रिक ऊर्जा E = K + U = Ek − 2 Ek = − E_k.
अतः कुल ऊर्जा का परिमाण गतिज ऊर्जा के बराबर किंतु चिह्न ऋणात्मक होता है।
प्रश्न 2: एक कृत्रिम उपग्रह r त्रिज्या की कक्षा में v चाल से घूम रहा है। यदि इसकी चाल में 41.4% की वृद्धि कर दी जाए, तो उपग्रह:
(A) 2r त्रिज्या की कक्षा में चला जाएगा
(B) पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से पलायन कर जाएगा
(C) पृथ्वी पर गिर जाएगा
(D) उसी कक्षा में बना रहेगा
उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से पलायन कर जाएगा
चरणबद्ध हल:
1. 41.4% वृद्धि का अर्थ है नई चाल v' = 1.414 v = √2 vo.
2. किसी कक्षा में पलायन वेग ve = √2 vo होता है।
3. जब चाल √2 vo हो जाती है, तो कुल यांत्रिक ऊर्जा E' = ½ m (√2 vo)2 − G M m / r = 0 हो जाती है।
4. अतः उपग्रह परवलयाकार मार्ग से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से पलायन कर जाएगा।
प्रश्न 3: पृथ्वी की सतह से भू-स्थिर उपग्रह की ऊंचाई लगभग कितनी होती है?
(A) 6,400 किमी
(B) 18,000 किमी
(C) 36,000 किमी
(D) 42,000 किमी
उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) 36,000 किमी
चरणबद्ध हल:
1. T = 24 घंटे हेतु केप्लर के तृतीय नियम से केंद्र से दूरी R + h ≈ 42,200 किमी आती है।
2. सतह से ऊंचाई h = 42,200 किमी − 6,400 किमी ≈ 35,800 किमी ≈ 36,000 किमी।

6. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. क्या किसी भू-स्थिर उपग्रह को दिल्ली या लंदन के ठीक ऊपर स्थापित किया जा सकता है?
नहीं! भू-स्थिर उपग्रह को अनिवार्य रूप से केवल और केवल विषुवतीय तल (Equatorial plane) में ही स्थापित किया जा सकता है। यदि किसी गैर-विषुवतीय अक्षांश पर कक्षा बनाई जाए, तो उसका कक्षीय केंद्र पृथ्वी का केंद्र होने के कारण उपग्रह उत्तर-दक्षिण में दोलन करेगा और किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं दिखेगा।
2. जब किसी उपग्रह की कक्षीय त्रिज्या बढ़ती है तो उसके परिक्रमण काल पर क्या प्रभाव पड़ता है?
केप्लर के तृतीय नियम (T2 ∝ r3) के अनुसार, कक्षीय त्रिज्या r बढ़ने पर परिक्रमण काल T बढ़ जाता है तथा कक्षीय चाल घट जाती है।
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