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कक्षा 11 · रसायन विज्ञानJEE MAIN × NEETEnglish
§ 7.4NCERT कक्षा 11 · रसायन विज्ञान · अध्याय 7

रेडॉक्स अनुमापन एवं विद्युत-रासायनिक सेल

रेडॉक्स सिद्धांत दो अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों में परिलक्षित होते हैं: मात्रात्मक विश्लेषणात्मक रसायन विज्ञान में रेडॉक्स आयतनमिति (Redox Titrimetry) के रूप में, तथा ऊर्जा रूपांतरण में विद्युत-रासायनिक (गैल्वेनिक) सेल के रूप में। इस मॉड्यूल में हम अनुमापन सूचकों, परमैंगनेतमिति, डाइक्रोमेटमिति, आयोडोमिति, डैनियल सेल की संरचना, लवण सेतु की कार्यप्रणाली, तथा विद्युत-रासायनिक श्रेणी के भविष्यसूचक अनुप्रयोगों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

1. रेडॉक्स अनुमापन: विश्लेषणात्मक सिद्धांत एवं सूचक

रेडॉक्स अनुमापन एक आयतनी विश्लेषणात्मक विधि है जिसका उपयोग स्टॉइकियोमीट्री इलेक्ट्रॉन तुल्यता के आधार पर ज्ञात सांद्रता वाले मानक अनुमापक से क्रिया कराकर किसी अज्ञात अपचायक अथवा ऑक्सीकारक विश्लेष्य की सांद्रता ज्ञात करने हेतु किया जाता है।

ऑक्सीकारक के तुल्यांक = अपचायक के तुल्यांक  ⇒  N₁ V₁ = N₂ V₂  ⇒  (M₁ × n₁) V₁ = (M₂ × n₂) V₂

रेडॉक्स सूचकों के तीन प्राथमिक वर्ग:

  1. स्व-सूचक (जैसे KMnO₄):

    पोटैशियम परमैंगनेट स्वयं अपने सूचक के रूप में कार्य करता है। अम्लीय विलयन में गहरा जामुनी MnO₄− आयन (+7 में Mn) वस्तुतः रंगहीन Mn²+ आयन में अपचयित हो जाता है:

    MnO₄− + 8H+ + 5e− → Mn²+ + 4H₂O  (n-कारक = 5)

    जब तक फ्लास्क में अपचायक (जैसे Fe²+, C₂O₄²−) उपस्थित रहता है, KMnO₄ की प्रत्येक बूंद तुरंत अपचयित होकर रंगहीन होती रहती है। तुल्यता बिंदु पर समस्त अपचायक समाप्त हो जाता है; अतः अगली एक अतिरिक्त बूंद विलयन को स्थायी हल्का गुलाबी रंग प्रदान कर देती है।

  2. आंतरिक रेडॉक्स सूचक (जैसे K₂Cr₂O₇ के साथ डाइफेनिलऐमीन):

    पोटैशियम डाइक्रोमेट (K₂Cr₂O₇) एक उत्कृष्ट प्राथमिक मानक है, परंतु इसका अपचयन उत्पाद Cr³+ गहरा हरा होता है जबकि Cr₂O₇²− नारंगी होता है। नारंगी से हरे रंग में परिवर्तन अत्यंत धीमा व क्रमिक होता है, जिससे नग्न आंखों द्वारा अंतिम बिंदु की पहचान असंभव होती है। अतः फॉस्फोरिक अम्ल (H₃PO₄) की उपस्थिति में एक आंतरिक सूचक, डाइफेनिलऐमीन (diphenylamine) मिलाया जाता है। तुल्यता बिंदु पर डाइक्रोमेट की पहली अतिरिक्त बूंद डाइफेनिलऐमीन को ऑक्सीकृत करके एक प्रदीप्त नीला-बैंगनी संकुल बना देती है।

  3. आयोडोमितीय एवं आयोडिमितीय अनुमापन में स्टार्च सूचक:

    मुक्त आयोडीन (I₂) स्टार्च के एमाइलोज घटक के साथ एक अत्यंत गहरा नीला अधिशोषण संकुल बनाती है। जब इसका अनुमापन सोडियम थायोसल्फेट (Na₂S₂O₃ / "हाइपो") के साथ किया जाता है, तो जब तक अंतिम I₂ अणु रंगहीन आयोडाइड (I−) में अपचयित नहीं हो जाता, विलयन गहरा नीला रहता है, और अंततः एक तीक्ष्ण नीले से रंगहीन अंतिम बिंदु प्राप्त होता है।

    I₂ + 2S₂O₃²− → 2I− + S₄O₆²−  (टेट्राथायोनेट आयन)

2. विद्युत-रासायनिक सेल: डैनियल सेल की संरचना

यदि कोई रेडॉक्स अभिक्रिया एक ही बीकर में संपन्न कराई जाए, तो इलेक्ट्रॉन स्थानांतरण संघट्ट कर रहे कणों के मध्य सीधे संपर्क द्वारा होता है, जिससे रासायनिक ऊर्जा पूर्णतः उष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है। इसके विपरीत, यदि ऑक्सीकरण और अपचयन अर्ध-अभिक्रियाओं को दो पृथक बीकरों (अर्ध-सेलों) में अलग रखकर उन्हें बाह्य इलेक्ट्रॉनिक चालक तथा आंतरिक आयनिक चालक द्वारा जोड़ दिया जाए, तो रासायनिक मुक्त ऊर्जा सीधे उपयोगी विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।

+-----------------------------------------------------------------------------------+ | डैनियल (गैल्वेनिक) सेल की संरचना एवं परिपथ | +-----------------------------------------------------------------------------------+ इलेक्ट्रॉनों (e-) का प्रवाह: ऐनोड से कैथोड की ओर -------> पारंपरिक विद्युत धारा (I): कैथोड से ऐनोड की ओर <--- [ वोल्टमीटर: E_cell = +1.10 V ] / जिंक छड़ (-) कॉपर छड़ (+) [ ऐनोड ] [ कैथोड ] | | +-----+-----+ +-------------------+ +-----+-----+ | | | लवण सेतु | | | | 1 M ZnSO4 |=======| (अगर-अगर में KCl)|===| 1 M CuSO4 | | | +-------------------+ | | +-----------+ +-----------+ ऑक्सीकरण अर्ध-सेल अपचयन अर्ध-सेल Zn(s) → Zn2+ + 2e- Cu2+ + 2e- → Cu(s) जिंक घुलता है (भार घटता है) कॉपर निक्षेपित होता है सेल संकेतन: Zn(s) | Zn2+(aq, 1 M) || Cu2+(aq, 1 M) | Cu(s) +-----------------------------------------------------------------------------------+
चित्र 7.5: डैनियल सेल — अर्ध-अभिक्रियाओं का भौतिक पृथक्करण एवं लवण सेतु संयोजन।

लवण सेतु की भूमिका एवं कार्यप्रणाली:

लवण सेतु कांच की एक उल्टी U-आकार की नली होती है जिसमें अगर-अगर जेल अथवा जिलेटिन के साथ किसी अक्रिय विद्युत-अपघट्य जैसे KCl, KNO₃, अथवा NH₄NO₃ का सांद्र विलयन भरा होता है।

  • आंतरिक विद्युत परिपथ को पूर्ण करना: यह दोनों अर्ध-सेल विलयनों को यांत्रिक रूप से आपस में मिश्रित हुए बिना आयनों के अंतर-प्रवाह की अनुमति देता है।
  • विद्युत तटस्थता का अनुरक्षण: सेल कार्यप्रणाली के दौरान ऐनोड कक्ष में Zn²+ आयन लगातार बढ़ते हैं जिससे धनावेश का संचय हो जाता है। साथ ही कैथोड पर Cu²+ निक्षेपित होने से SO₄²− आयनों का ऋणावेश बढ़ जाता है। लवण सेतु ऐनोड कक्ष में ऋणायन (Cl−) तथा कैथोड कक्ष में धनायन (K+) भेजकर दोनों विलयनों को विद्युत-तटस्थ बनाए रखता है तथा द्रव संधि विभव (Liquid Junction Potential) को समाप्त करता है।
  • समान आयनिक गतिशीलता की अनिवार्यता: प्रयुक्त लवण के धनायन एवं ऋणायन की आयनिक गतिशीलता (चालकता) लगभग समान होनी चाहिए ताकि कोई विसरण विभव उत्पन्न न हो सके।

3. मानक इलेक्ट्रोड विभव एवं विद्युत-रासायनिक श्रेणी

जब किसी धातु की छड़ को उसी के आयनों वाले विलयन में डुबोया जाता है, तो धातु और विलयन के अंतरापृष्ठ पर एक विद्युत विभवांतर उत्पन्न हो जाता है, जिसे इलेक्ट्रोड विभव कहते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय IUPAC समझौते के अनुसार, मानक इलेक्ट्रोड विभव को सदैव मानक अपचयन विभव (E°) के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसे 298 K ताप, 1 बार दाब तथा 1.0 M आयन सांद्रता पर मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड (SHE) के सापेक्ष मापा जाता है, जिसका स्वेच्छ मानक विभव ठीक 0.00 V माना गया है।

E°_cell = E°_cathode (अपचयन) − E°_anode (ऑक्सीकरण)
+-----------------------------------------------------------------------------------+ | विद्युत-रासायनिक श्रेणी: ऊष्मागतिक प्रवृत्तियां एवं मान | +-----------------------------------------------------------------------------------+ मानक अपचयन विभव E° (V) रेडॉक्स युग्म ^ -3.05 V (सर्वाधिक ऋणात्मक) Li+ + e- <===> Li(s) | -2.87 V Ca2+ + 2e- <===> Ca(s) | -2.71 V Na+ + e- <===> Na(s) | -2.36 V Mg2+ + 2e- <===> Mg(s) | -0.76 V Zn2+ + 2e- <===> Zn(s) | -0.44 V Fe2+ + 2e- <===> Fe(s) | 0.00 V (स्वेच्छ मानक संदर्भ) 2H+ + 2e- <===> H2(g) [SHE] | +0.34 V Cu2+ + 2e- <===> Cu(s) | +0.80 V Ag+ + e- <===> Ag(s) | +1.33 V Cr2O7^2- + 14H+ + 6e- <===> 2Cr3+ | +1.51 V MnO4- + 8H+ + 5e- <===> Mn2+ v +2.87 V (सर्वाधिक धनात्मक) F2(g) + 2e- <===> 2F- प्रवृत्ति दिशा: • ऊपर की ओर जाने पर (ऋणात्मक E°): अपचायक क्षमता बढ़ती है (Li प्रबलतम अपचायक है)। • नीचे की ओर जाने पर (धनात्मक E°): ऑक्सीकारक क्षमता बढ़ती है (F2 प्रबलतम ऑक्सीकारक है)। +-----------------------------------------------------------------------------------+
चित्र 7.6: विद्युत-रासायनिक श्रेणी — सापेक्षिक ऑक्सीकारक एवं अपचायक क्षमताओं का क्रम।
रेडॉक्स अभिक्रिया की स्वतःप्रवर्तिता (Spontaneity) का पूर्वानुमान:

किसी रेडॉक्स अभिक्रिया के मानक गिब्स मुक्त ऊर्जा परिवर्तन एवं मानक सेल विभव के मध्य संबंध:

ΔG° = − n F E°_cell

कोई रासायनिक रेडॉक्स प्रक्रम मानक अवस्थाओं में ऊष्मागतिक रूप से स्वतःप्रवर्तित होगा यदि और केवल यदि:

E°_cell > 0  ⇒  ΔG° < 0

4. हल किए गए उदाहरण एवं आंकिक प्रश्न

उदाहरण 1: 1 M Ni²+ में डूबे निकेल इलेक्ट्रोड तथा 1 M Al³+ में डूबे ऐलुमिनियम इलेक्ट्रोड से निर्मित गैल्वेनिक सेल के लिए मानक सेल विभव (E°_cell) ज्ञात करें तथा अभिक्रिया की स्वतःप्रवर्तित दिशा बताएं। दिया है: E°(Ni²+/Ni) = -0.25 V तथा E°(Al³+/Al) = -1.66 V।
हल:

चरण 1: ऐनोड एवं कैथोड की पहचान:

जिस इलेक्ट्रोड का अपचयन विभव अधिक ऋणात्मक होता है, उसमें ऑक्सीकृत होने (इलेक्ट्रॉन त्यागने) की तीव्र प्रवृत्ति होती है, अतः वह ऐनोड का कार्य करता है।

E°(Al³+/Al) = -1.66 V < E°(Ni²+/Ni) = -0.25 V ⇒ ऐलुमिनियम ऐनोड है तथा निकेल कैथोड है।

चरण 2: अर्ध-अभिक्रियाएं एवं सेल निरूपण:

  • ऐनोड (ऑक्सीकरण): 2Al(s) → 2Al³+(aq) + 6e−
  • कैथोड (अपचयन): 3Ni²+(aq) + 6e− → 3Ni(s)
  • सेल आरेख: Al(s) | Al³+(aq) || Ni²+(aq) | Ni(s)

चरण 3: मानक सेल विभव की गणना:

E°_cell = E°_cathode − E°_anode = (-0.25 V) − (-1.66 V) = +1.41 V।

चूंकि E°_cell > 0, अतः अग्र दिशा में अभिक्रिया स्वतःप्रवर्तित है: 2Al(s) + 3Ni²+(aq) → 2Al³+(aq) + 3Ni(s)।

उदाहरण 2: तनु सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में 25.0 mL 0.10 M FeSO₄ विलयन को पूर्णतः ऑक्सीकृत करने के लिए 0.02 M KMnO₄ विलयन के कितने आयतन (mL) की आवश्यकता होगी?
हल:

चरण 1: अभिकारकों के n-कारक (संयोजकता कारक) ज्ञात करना:

  • अम्लीय माध्यम में: MnO₄− + 8H+ + 5e− → Mn²+ + 4H₂O ⇒ KMnO₄ का n-कारक = 5।
  • Fe²+ → Fe³+ + e− ⇒ FeSO₄ का n-कारक = 1।

चरण 2: रासायनिक तुल्यता के नियम का अनुप्रयोग:

KMnO₄ के ग्राम तुल्यांक = FeSO₄ के ग्राम तुल्यांक

(M₁ × n₁ × V₁) = (M₂ × n₂ × V₂)

(0.02 M × 5 × V₁) = (0.10 M × 1 × 25.0 mL)

0.10 × V₁ = 2.50

V₁ = 2.50 / 0.10 = 25.0 mL।

उदाहरण 3: अशुद्ध कॉपर अयस्क के 0.20 g नमूने को घोलकर आधिक्य KI के साथ अभिकृत किया गया। मुक्त हुई आयोडीन के पूर्ण अनुमापन हेतु 0.05 M Na₂S₂O₃ के 20.0 mL विलयन की आवश्यकता पड़ी। अयस्क में कॉपर का प्रतिशत ज्ञात करें। (Cu का परमाणु द्रव्यमान = 63.5 g/mol)।
हल:

चरण 1: रासायनिक रससमीकरणमिति (स्टॉइकियोमीट्री):

2Cu²+ + 4I− → Cu₂I₂(s) + I₂

I₂ + 2S₂O₃²− → 2I− + S₄O₆²−

रससमीकरणमिति से: 2 मोल Cu²+ ≡ 1 मोल I₂ ≡ 2 मोल S₂O₃²−।

अतः Cu के मोल = प्रयुक्त S₂O₃²− के मोल।

चरण 2: Cu के मोल एवं द्रव्यमान की गणना:

S₂O₃²− के मोल = M × V(L) = 0.05 × (20.0 / 1000) = 1.0 × 10&sup-3; mol।

Cu के मोल = 1.0 × 10&sup-3; mol।

Cu का द्रव्यमान = 1.0 × 10&sup-3; mol × 63.5 g/mol = 0.0635 g।

चरण 3: शुद्धता प्रतिशत की गणना:

% Cu = (Cu का द्रव्यमान / अयस्क का कुल द्रव्यमान) × 100 = (0.0635 g / 0.20 g) × 100 = 31.75%।

उदाहरण 4: दिए गए मानक विभव: E°(Fe³+/Fe²+) = +0.77 V तथा E°(I₂/I−) = +0.54 V के आधार पर बताएं कि क्या मानक परिस्थितियों में जलीय विलयन में Fe³+ आयन I− आयनों को I₂ में स्वतःप्रवर्तित रूप से ऑक्सीकृत कर सकते हैं?
हल:

चरण 1: प्रस्तावित रेडॉक्स अभिक्रिया:

2Fe³+(aq) + 2I−(aq) → 2Fe²+(aq) + I₂(s)

चरण 2: अर्ध-अभिक्रियाओं की पहचान:

  • कैथोड (अपचयन): Fe³+ + e− → Fe²+  (E° = +0.77 V)
  • ऐनोड (ऑक्सीकरण): 2I− → I₂ + 2e−  (E° = +0.54 V)

चरण 3: E°_cell की गणना:

E°_cell = E°_cathode − E°_anode = +0.77 V − (+0.54 V) = +0.23 V।

चूंकि E°_cell > 0, अतः ΔG° ऋणात्मक है, और Fe³+ वास्तव में I− को I₂ में स्वतःप्रवर्तित रूप से ऑक्सीकृत करेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs - कक्षा 11 एवं प्रतियोगी परीक्षाएं)

प्र1. सिल्वर (Ag⁺) अथवा लेड (Pb²⁺) आयनों वाले सेल में KCl लवण सेतु का उपयोग क्यों नहीं किया जा सकता?
यदि Ag⁺ या Pb²⁺ आयन युक्त विलयनों में KCl लवण सेतु का उपयोग किया जाए, तो लवण सेतु से विसरित होने वाले क्लोराइड आयन (Cl⁻) धातु आयनों के साथ क्रिया करके अविलेय अवक्षेप (AgCl अथवा PbCl₂) बना लेते हैं। यह अवक्षेपण नली के रंध्रों को अवरुद्ध कर देता है, आयनिक सांद्रता में अनियमित परिवर्तन लाता है तथा इलेक्ट्रोड विभव को बिगाड़ देता है। ऐसी स्थिति में KNO₃ अथवा NH₄NO₃ लवण सेतु का उपयोग किया जाना चाहिए।
प्र2. अम्लीय, उदासीन तथा प्रबल क्षारीय माध्यमों में KMnO₄ का तुल्यांकी भार क्या होता है?
तुल्यांकी भार = अणुभार (M) / n-कारक: (1) अम्लीय माध्यम में: MnO₄⁻ → Mn²⁺ (5e⁻ का परिवर्तन, n = 5) ⇒ तुल्यांकी भार = M / 5 = 158 / 5 = 31.6 g/eq। (2) उदासीन / दुर्बल क्षारीय माध्यम में: MnO₄⁻ → MnO₂ (3e⁻ का परिवर्तन, n = 3) ⇒ तुल्यांकी भार = M / 3 = 158 / 3 = 52.67 g/eq। (3) प्रबल क्षारीय माध्यम में: MnO₄⁻ → MnO₄²⁻ (1e⁻ का परिवर्तन, n = 1) ⇒ तुल्यांकी भार = M / 1 = 158 g/eq।
प्र3. कॉपर तनु HCl से क्रिया करके हाइड्रोजन गैस क्यों नहीं देता, जबकि सांद्र HNO₃ से तीव्र अभिक्रिया करता है?
कॉपर का मानक अपचयन विभव (E° = +0.34 V) हाइड्रोजन (E° = 0.00 V) से अधिक धनात्मक है; अतः Cu तनु HCl से अनॉक्सीकारक H⁺ आयनों को अपचयित नहीं कर सकता। इसके विपरीत सांद्र HNO₃ एक अत्यंत प्रबल ऑक्सीकारक अम्ल है जिसके नाइट्रेट आयन (NO₃⁻) का अपचयन विभव अत्यंत उच्च (+0.96 V) होता है। यह कॉपर को Cu²⁺ में सरलता से ऑक्सीकृत कर देता है तथा स्वयं भूरी NO₂ गैस में अपचयित हो जाता है: Cu + 4HNO₃ → Cu(NO₃)₂ + 2NO₂ + 2H₂O।
प्र4. विद्युत-अपघटनी सेल (Electrolytic cell) और गैल्वेनिक सेल में क्या अंतर है?
गैल्वेनिक (वोल्टीय) सेल स्वतःप्रवर्तित रासायनिक रेडॉक्स अभिक्रिया (ΔG < 0, E_cell > 0) की रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है (इसमें ऐनोड ऋणात्मक तथा कैथोड धनात्मक होता है)। जबकि विद्युत-अपघटनी सेल बाह्य विद्युत ऊर्जा स्रोत का उपयोग करके एक अस्वतःप्रवर्तित रासायनिक रेडॉक्स प्रक्रम (ΔG > 0) को संपन्न कराता है (इसमें ऐनोड धनात्मक तथा कैथोड ऋणात्मक होता है)।
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