ऑक्सीकरण संख्या के नियम एवं संरचनात्मक अनुप्रयोग
आयनिक अभिक्रियाओं में इलेक्ट्रॉन स्थानांतरण स्पष्ट दिखाई देता है, किंतु अनेक सहसंयोजी अणुओं में इलेक्ट्रॉन पूर्णतः स्थानांतरित न होकर केवल पुनर्वितरित होते हैं। इस प्रकार के यौगिकों में इलेक्ट्रॉन घनत्व के विस्थापन को व्यवस्थित रूप से ट्रैक करने हेतु रसायनशास्त्रियों ने ऑक्सीकरण संख्या (Oxidation Number / State) की संकल्पना विकसित की। इस मॉड्यूल में हम एनसीईआरटी के मूलभूत नियमों, संरचनात्मक अपवादों, भिन्नात्मक अवस्थाओं तथा स्टॉक संकेतन का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
1. परिभाषा एवं मूलभूत संकल्पनाएं
किसी यौगिक में उपस्थित किसी तत्व की ऑक्सीकरण संख्या उस विद्युत आवेश के बराबर होती है जो उस तत्व का परमाणु तब ग्रहण करता प्रतीत होता है जब उससे जुड़े अन्य सभी परमाणुओं को साझे के इलेक्ट्रॉन युग्म सहित अधिक विद्युत ऋणात्मक परमाणु को सौंपकर आयनों के रूप में पृथक मान लिया जाए।
संयोजकता बनाम ऑक्सीकरण संख्या
- संयोजकता (Valency): किसी तत्व की संयोजन क्षमता। यह सदैव एक पूर्ण संख्या (1, 2, 3...) होती है और इसके आगे कोई धनात्मक या ऋणात्मक चिह्न नहीं होता।
- ऑक्सीकरण संख्या: विद्युत ऋणात्मकता पर आधारित औपचारिक आवेश। यह धनात्मक, ऋणात्मक, शून्य अथवा भिन्नात्मक हो सकती है।
- उदाहरण: CH₄ में C की संयोजकता 4 तथा ऑक्सीकरण संख्या -4 है। CH₂Cl₂ में संयोजकता 4 तथा ऑक्सीकरण संख्या 0 है। CCl₄ में संयोजकता 4 तथा ऑक्सीकरण संख्या +4 है।
मूलभूत नियम का आधार
समान परमाणुओं के मध्य बने सहसंयोजी बंध में (जैसे C–C, Cl–Cl) इलेक्ट्रॉनों का समान साझा होता है, अतः किसी भी परमाणु पर कोई आवेश नहीं माना जाता (योगदान = 0)।
भिन्न परमाणुओं के मध्य बंध में साझे का युग्म अधिक विद्युत ऋणात्मक परमाणु को आबंटित किया जाता है (विद्युत ऋणात्मकता क्रम: F > O > N ≈ Cl > Br > I > S > C > H > धातुएं)।
2. ऑक्सीकरण संख्या निर्धारण के सात सार्वत्रिक एनसीईआरटी नियम
-
मुक्त / तात्विक अवस्था: अपनी मुक्त अथवा असंबद्ध तात्विक अवस्था में प्रत्येक तत्व की ऑक्सीकरण संख्या सदैव शून्य होती है।
उदाहरण: H₂, O₂, Cl₂, O₃, P₄, S₈, Na, Mg, Fe, C(ग्रेफाइट) → सभी में ऑक्सीकरण संख्या = 0। -
एक-परमाण्विक आयन: एक-परमाण्विक आयनों में ऑक्सीकरण संख्या आयन पर उपस्थित वास्तविक विद्युत आवेश के बराबर होती है।
उदाहरण: Na+ (+1), Mg²+ (+2), Al³+ (+3), Fe³+ (+3), Cl− (-1), O²− (-2), N³− (-3)। -
ऑक्सीजन परमाणु:
- अधिकांश सामान्य यौगिकों (ऑक्साइडों) में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या -2 होती है (जैसे H₂O, CO₂, H₂SO₄)।
- परॉक्साइडों में (−O–O− बंध युक्त) ऑक्सीजन की संख्या -1 होती है (जैसे H₂O₂, Na₂O₂, BaO₂)।
- सुपरऑक्साइडों में (O₂− आयन युक्त) ऑक्सीजन की संख्या -1/2 होती है (जैसे KO₂, RbO₂, CsO₂)।
- फ्लोराइडों में फ्लोरीन अधिक विद्युत ऋणात्मक होने के कारण: OF₂ में ऑक्सीजन +2 तथा O₂F₂ में +1 होती है।
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हाइड्रोजन परमाणु:
- अधातुओं के साथ बने यौगिकों में हाइड्रोजन सदैव +1 होता है (जैसे H₂O, HCl, NH₃, CH₄)।
- सक्रिय धातुओं के साथ बने द्विअंगी धातु हाइड्राइडों में हाइड्रोजन आयनिक हाइड्राइड (H−) के रूप में -1 होता है (जैसे LiH, NaH, CaH₂)।
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हैलोजन (वर्ग 17):
- फ्लोरीन सर्वाधिक विद्युत ऋणात्मक होने के कारण अपने सभी यौगिकों में सदैव -1 ऑक्सीकरण संख्या दर्शाता है।
- अन्य हैलोजन (Cl, Br, I) सामान्य हैलाइडों में -1 दर्शाते हैं, किंतु अधिक विद्युत ऋणात्मक तत्वों (O तथा F) के साथ जुड़े होने पर वे +1, +3, +5, +7 जैसी धनात्मक अवस्थाएं दर्शाते हैं (जैसे HClO (+1), KClO₃ (+5), HClO₄ (+7), IF₇ (+7))।
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वर्ग 1 एवं 2 की धातुएं:
क्षार धातुओं (Li, Na, K, Rb, Cs) की ऑक्सीकरण संख्या सदैव +1, क्षारीय मृदा धातुओं (Be, Mg, Ca, Sr, Ba) की सदैव +2, तथा ऐलुमिनियम की सदैव +3 होती है। -
ऑक्सीकरण संख्याओं का योग:
- किसी उदासीन अणु में उपस्थित सभी परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्याओं का बीजगणितीय योग शून्य होता है।
- किसी बहुपरमाण्विक आयन में सभी परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्याओं का योग उस आयन पर उपस्थित कुल आवेश के बराबर होता है। (जैसे SO₄²− में: S + 4(-2) = -2 ⇒ S = +6)।
3. भिन्नात्मक ऑक्सीकरण अवस्था का विरोधाभास एवं संरचनात्मक वास्तविकता
बीजगणितीय सूत्रों का यांत्रिक प्रयोग करने पर कभी-कभी भिन्नात्मक ऑक्सीकरण संख्याएं प्राप्त होती हैं। वास्तव में कोई परमाणु इलेक्ट्रॉन का भिन्नात्मक अंश नहीं त्याग सकता। भिन्नात्मक ऑक्सीकरण संख्या केवल एक अणु में भिन्न संरचनात्मक स्थितियों में स्थित परमाणुओं का औसत मान होती है।
| अणु / आयन | बीजगणितीय आभासी सूत्र | वास्तविक संरचना एवं बंध | व्यक्तिगत वास्तविक अवस्थाएं | औसत मान |
|---|---|---|---|---|
| CrO₅ (ब्लू परक्रोमेट) | Cr + 5(-2) = 0 ⇒ +10 (असंभव) | तितली संरचना: 1 ऑक्सो (=O), 2 परॉक्सी (−O–O−) वलय | Cr = +6; 1 O at -2; 4 O at -1 | Cr = +6 |
| H₂SO₅ (कारो अम्ल) | 2(+1) + S + 5(-2) = 0 ⇒ +8 (असंभव) | परॉक्सोमोनोसल्फ्यूरिक अम्ल: 1 परॉक्सी (−O–O−) बंध उपस्थित | S = +6; 3 O at -2; 2 O at -1 | S = +6 |
| H₂S₂O₈ (मार्शल अम्ल) | 2(+1) + 2S + 8(-2) = 0 ⇒ +7 (असंभव) | परॉक्सोडाइसल्फ्यूरिक अम्ल: दो −SO₃H के मध्य 1 परॉक्सी सेतु | दोनों S = +6; 6 O at -2; 2 O at -1 | S = +6 |
| C₃O₂ (कार्बन सबऑक्साइड) | 3C + 2(-2) = 0 ⇒ C = +4/3 | रैखिक O=C=C*=C=O संरचना | छोर वाले C = +2; केंद्रीय C* = 0 | औसत = +4/3 |
| S₄O₆²− (टेट्राथायोनेट) | 4S + 6(-2) = -2 ⇒ S = +2.5 | −O₃S–S–S–SO₃− शृंखला | छोर वाले दो S = +5; मध्यवर्ती दो S = 0 | औसत = +2.5 |
| Fe₃O₄ (मैग्नेटाइट) | 3Fe + 4(-2) = 0 ⇒ Fe = +8/3 | मिश्रित ऑक्साइड: FeO · Fe₂O₃ (स्पिनेल जालक) | एक Fe²+ (+2); दो Fe³+ (+3) | औसत = +8/3 |
4. स्टॉक संकेतन एवं नामकरण पद्धति
सन् 1919 में जर्मन रसायनशास्त्री अल्फ्रेड स्टॉक ने किसी यौगिक में तत्व की ऑक्सीकरण संख्या को उसके नाम अथवा सूत्र के ठीक बाद कोष्ठक में रोमन अंकों द्वारा लिखने का प्रस्ताव दिया।
साधारण अकार्बनिक यौगिक:
- FeSO₄ → Fe(II)SO₄ [आयरन(II) सल्फेट]
- Fe₂(SO₄)₃ → Fe₂(III)(SO₄)₃ [आयरन(III) सल्फेट]
- Cu₂O → Cu₂(I)O [कॉपर(I) ऑक्साइड]
- CuO → Cu(II)O [कॉपर(II) ऑक्साइड]
- MnO₂ → Mn(IV)O₂ [मैंगनीज(IV) ऑक्साइड]
उपसहसंयोजन / जटिल यौगिक:
- HAuCl₄ → H[Au(III)Cl₄] [हाइड्रोजन टेट्राक्लोरोऑरेट(III)]
- K₂Cr₂O₇ → पोटैशियम डाइक्रोमेट(VI)
- KMnO₄ → पोटैशियम परमैंगनेट(VII)
- K₄[Fe(CN)₆] → पोटैशियम हेक्सासायनोफेरेट(II)
- K₃[Fe(CN)₆] → पोटैशियम हेक्सासायनोफेरेट(III)
5. हल किए गए उदाहरण एवं संख्यात्मक अनुप्रयोग
(क) KMnO₄ में: K = +1, O = -2। माना Mn = x।
(+1) + x + 4(-2) = 0 ⇒ x − 7 = 0 ⇒ Mn = +7।
(ख) K₂Cr₂O₇ में: K = +1, O = -2। माना Cr = x।
2(+1) + 2x + 7(-2) = 0 ⇒ 2 + 2x − 14 = 0 ⇒ 2x = 12 ⇒ Cr = +6।
(ग) NaH₂PO₄ में: Na = +1, H = +1, O = -2। माना P = x।
(+1) + 2(+1) + x + 4(-2) = 0 ⇒ 3 + x − 8 = 0 ⇒ P = +5।
(घ) NH₄NO₃ में: यह NH₄+ तथा NO₃− आयनों से निर्मित है। दोनों नाइट्रोजन परमाणुओं की अवस्थाएं पूर्णतः भिन्न हैं:
- NH₄+ में: x + 4(+1) = +1 ⇒ N = -3।
- NO₃− में: y + 3(-2) = -1 ⇒ N = +5।
औसत +1 लिखने से अणु की वास्तविक रासायनिक प्रकृति छिप जाती है।
चरण 1: बीजगणितीय औसत:
2(+1) + 2(S) + 3(-2) = 0 ⇒ 2S = 4 ⇒ S = +2 (औसत)।
चरण 2: संरचनात्मक विश्लेषण:
थायोसल्फेट आयन [S₂O₃]²− सल्फेट आयन [SO₄]²− से व्युत्पन्न होता है जिसमें एक ऑक्सीजन को छोर वाले सल्फर द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है:
[O₃S − S]²−
छोर वाला सल्फर सल्फाइड (S²−) आयन के समान व्यवहार करता है, अतः इसकी ऑक्सीकरण संख्या -2 (अथवा 0) होती है। केंद्रीय सल्फर तीन ऑक्सीजन (-2 प्रत्येक) तथा एक छोर वाले सल्फर से बंधा होने के कारण +6 (अथवा +4) अवस्था में होता है।
एनसीईआरटी मानक के अनुसार: छोर वाला S = -2, केंद्रीय S = +6; औसत = (+6 + (-2)) / 2 = +2।
चरण 1: संघटक आयनों की पहचान:
विरंजक चूर्ण कैल्शियम आयन (Ca²+), क्लोराइड आयन (Cl−) तथा हाइपोक्लोराइट आयन (OCl−) से बना मिश्रित लवण है:
Ca²+ [Cl]− [OCl]−
चरण 2: दोनों क्लोरीन परमाणुओं की अवस्थाएं:
- साधारण क्लोराइड आयन (Cl−) में: ऑक्सीकरण संख्या = -1।
- हाइपोक्लोराइट आयन (OCl−) में: O = -2, माना Cl = x ⇒ (-2) + x = -1 ⇒ x = +1।
अतः ब्लीचिंग पाउडर में दोनों क्लोरीन परमाणु -1 तथा +1 अवस्थाओं में उपस्थित होते हैं (औसत = 0)।
चरण 1: आवर्त सारणी वर्ग सीमाएं:
- वर्ग 15 (ns² np³): अधिकतम = +5 (सभी 5 संयोजी इलेक्ट्रॉन त्यागना); न्यूनतम = 5 − 8 = -3 (अष्टक पूर्ण करने हेतु 3 इलेक्ट्रॉन ग्रहण करना)।
- वर्ग 16 (ns² np⁴): अधिकतम = +6 (सभी 6 इलेक्ट्रॉन त्यागना); न्यूनतम = 6 − 8 = -2 (2 इलेक्ट्रॉन ग्रहण करना)।
चरण 2: HNO₃ बनाम HNO₂ का विश्लेषण:
- HNO₃ (नाइट्रिक अम्ल) में नाइट्रोजन अपनी उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था +5 में है। यह अपनी अवस्था को और नहीं बढ़ा सकता (ऑक्सीकृत नहीं हो सकता)। यह केवल अवस्था घटा सकता है (इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर अपचयित हो सकता है)। अतः HNO₃ केवल ऑक्सीकारक का कार्य करता है।
- HNO₂ (नाइट्रस अम्ल) में नाइट्रोजन मध्यवर्ती अवस्था +3 में है। यह +5 में ऑक्सीकृत होकर अपचायक का कार्य कर सकता है, अथवा +2, +1, 0, -3 में अपचयित होकर ऑक्सीकारक का कार्य कर सकता है। अतः यह ऑक्सीकारक एवं अपचायक दोनों का कार्य करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
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