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कक्षा 11 · रसायन विज्ञानJEE MAIN × NEETEnglish
§ 6.2NCERT कक्षा 11 · रसायन विज्ञान · अध्याय 6

अम्ल, क्षारक, जल का स्वतः आयनन (Kw), pH पैमाना एवं दुर्बल विद्युत अपघट्य

जलीय विलयनों में होने वाले परिवर्तनों का नियमन आयनिक साम्यावस्था द्वारा होता है। जैविक प्रक्रमों से लेकर औद्योगिक अम्ल-क्षारक अनुमापनों तक, हाइड्रोनियम आयनों के सांद्रण, आयनन स्थिरांकों (Ka, Kb) तथा लघुगणकीय pH पैमाने की मात्रात्मक समझ रसायन विज्ञान का विश्लेषणात्मक आधार बनाती है।

1. अम्ल एवं क्षारक की शास्त्रीय तथा आधुनिक अवधारणाएं

सिद्धांत / मॉडल अम्ल की परिभाषा क्षारक की परिभाषा सीमाएं एवं प्रमुख उदाहरण
ऑरेनियस सिद्धांत जलीय विलयन में H+ (या H3O+) देता है (उदा. HCl, HNO3) जलीय विलयन में OH− देता है (उदा. NaOH, KOH) केवल जलीय विलायकों तक सीमित; NH3 की क्षारकीयता या AlCl3 की अम्लीयता नहीं समझा पाता।
ब्रान्स्टेड-लॉरी सिद्धांत प्रोटॉन (H+) दाता प्रोटॉन (H+) ग्राही संयुग्मी अम्ल-क्षारक युग्म (Conjugate Pairs) प्रस्तुत करता है जिनमें केवल एक प्रोटॉन (H+) का अंतर होता है।
लुईस इलेक्ट्रॉनिक सिद्धांत इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्राही (इलेक्ट्रॉन-रागी, रिक्त कक्षक, उदा. BF3, AlCl3, Fe3+) इलेक्ट्रॉन-युग्म दाता (नाभिक-रागी, एकाकी युग्म, उदा. :NH3, H2O:, F−) सर्वाधिक व्यापक सिद्धांत; प्रोटॉन स्थानांतरण के बिना गैसीय तथा अजलीय माध्यमों में भी लागू होता है।

संयुग्मी अम्ल-क्षारक युग्म का नियम

किसी भी ब्रान्स्टेड अभिक्रिया में: HA + B ⇔ BH+ + A−। यहाँ A− स्पीशीज HA का संयुग्मी क्षारक है, और BH+ स्पीशीज B का संयुग्मी अम्ल है। मूलभूत सिद्धांत:

सामर्थ्य संबंध: एक प्रबल अम्ल का संयुग्मी क्षारक अत्यंत दुर्बल होता है (उदा. HCl प्रबल है, तो Cl− नगण्य क्षारक है)। इसके विपरीत, एक दुर्बल अम्ल का संयुग्मी क्षारक अपेक्षाकृत प्रबल होता है (उदा. CH3COOH दुर्बल है, तो CH3COO− आसानी से जल-अपघटित होता है)।

2. जल का स्वतः आयनन एवं आयनिक गुणनफल (Kw)

शुद्ध द्रव जल अत्यंत अल्प मात्रा में स्वतः आयनित होता है:

H2O(l) + H2O(l) ⇔ H3O+(aq) + OH−(aq)   (ΔH > 0, ऊष्माशोषी)

इसके साम्य स्थिरांक का व्यंजक है:

जल का आयनिक गुणनफल (Kw):
Kw = [H+] [OH−] = 1.0 × 10−14   (298 K / 25°C पर)
ऋणात्मक लघुगणक लेने पर: pKw = pH + pOH = 14.00 (298 K पर)।
महत्वपूर्ण सावधानी — Kw की ताप पर निर्भरता:
चूँकि जल का स्वतः आयनन ऊष्माशोषी है, ताप बढ़ाने पर Kw बढ़ता है (उदा. 373 K / 100°C पर Kw ≈ 5.5 × 10−13, जिससे pKw ≈ 12.26)। 100°C पर शुद्ध उदासीन जल में [H+] = [OH−] ≈ 7.4 × 10−7 M होता है, अर्थात 100°C पर उदासीन जल का pH लगभग 6.1 होता है, 7.0 नहीं! उदासीनता का वास्तविक अर्थ [H+] = [OH−] होना है, pH = 7 होना नहीं।

pH पैमाना एवं आयनिक सांद्रता स्पेक्ट्रम (298 K पर)

हाइड्रोनियम एवं हाइड्रॉक्साइड आयन सांद्रता का लघुगणकीय निरूपण
[H+] (M)   10^0   10^-2   10^-4   10^-6   10^-7   10^-8   10^-10  10^-12  10^-14
pH          0      2       4       6       7       8       10      12      14
           |------- प्रबल अम्लीय --------| उदासीन |------- प्रबल क्षारकीय -------|
pOH        14     12      10       8       7       6        4       2       0
[OH-] (M) 10^-14 10^-12  10^-10  10^-8   10^-7   10^-6   10^-4   10^-2   10^0
--------------------------------------------------------------------------------
मूलभूत सूत्र: pH = -log10 [H3O+]    |    pOH = -log10 [OH-]    |    pH + pOH = pKw
      
अत्यधिक तनुता संबंधी चेतावनी: 10−8 M HCl विलयन का pH 8 नहीं होता (अम्ल कभी क्षारीय नहीं हो सकता!)। जल के स्वतः आयनन से प्राप्त H+ (~10−7 M) को जोड़ना अनिवार्य है: [H+]कुल = 10−8 + x, जहाँ x(10−8 + x) = 10−14 ⇒ [H+] ≈ 1.05 × 10−7 M ⇒ pH ≈ 6.98।

3. दुर्बल एक-क्षारकीय अम्ल एवं ओस्टवाल्ड का तनुता नियम

दुर्बल अम्ल जलीय माध्यम में आंशिक रूप से वियोजित होते हैं:

HA(aq) ⇔ H+(aq) + A−(aq)

माना प्रारंभिक सांद्रता c तथा वियोजन की मात्रा α है (0 < α < 1):

  • साम्य सांद्रताएं: [HA] = c(1 − α), [H+] = cα, [A−] = cα
  • अम्ल आयनन स्थिरांक: Ka = (cα · cα) / [c(1 − α)] = cα2 / (1 − α)
ओस्टवाल्ड का तनुता नियम सन्निकटन:
जब α ≤ 0.05 (5% से कम वियोजन) हो, तो 1 − α ≈ 1 लिया जाता है। अतः:
α = √(Ka / c)
[H+] = c α = √(Ka · c)
pH = ½ [pKa − log c]

दुर्बल क्षारक एवं Kb

इसी प्रकार दुर्बल क्षारक BOH(aq) ⇔ B+(aq) + OH−(aq) के लिए:

Kb = cα2 / (1 − α) ≈ cα2 ⇒ [OH−] = √(Kb · c)
pOH = ½ [pKb − log c]   तथा   pH = 14 − pOH

4. संयुग्मी युग्म संबंध एवं बहुक्षारकीय अम्ल

किसी भी संयुग्मी अम्ल-क्षारक युग्म (उदा. NH4+ व NH3, या CH3COOH व CH3COO−) के लिए:

Ka · Kb = Kw   ⇒   pKa + pKb = pKw = 14.00 (298 K पर)

बहुक्षारकीय अम्लों का आयनन

एक से अधिक आयननीय प्रोटॉन वाले अम्ल उत्तरोत्तर पदों में वियोजित होते हैं:

  • प्रथम पद: H2A ⇔ H+ + HA−   (Ka1)
  • द्वितीय पद: HA− ⇔ H+ + A2−   (Ka2)

स्थिर-वैद्युत आकर्षण के कारण, एक ऋणावेशित ऋणायन (HA−) से धनावेशित प्रोटॉन को निकालना एक उदासीन अणु (H2A) से निकालने की तुलना में अत्यंत कठिन होता है। अतः:

Ka1 ≫ Ka2 ≫ Ka3
द्विक्षारकीय अम्लों (जैसे H2S या H2CO3) के लिए जहाँ Ka1 ≫ Ka2 हो:
  • विलयन का [H+] और pH लगभग पूरी तरह प्रथम आयनन पद द्वारा निर्धारित होता है: [H+] ≈ √(Ka1 · c)।
  • द्विसंयोजी ऋणायन की सांद्रता [A2−] लगभग Ka2 के बराबर होती है, जो प्रारंभिक अम्ल सांद्रता c से स्वतंत्र होती है!

5. हल किए गए अभ्यास प्रश्न (JEE Main & NEET)

उदाहरण 1: 0.05 M ऐसीटिक अम्ल (CH3COOH) विलयन का pH परिकलित कीजिए। दिया गया है Ka = 1.8 × 10⁻⁵। जांच कीजिए कि क्या ओस्टवाल्ड सन्निकटन मान्य है।
सही उत्तर: pH = 3.02 (α = 1.9%, सन्निकटन पूर्णतः मान्य है)
चरणबद्ध हल:
1. α की जांच करें: α = √(Ka / c) = √[(1.8 × 10−5) / 0.05] = √(3.6 × 10−4) = 0.019 (1.9%)।
2. चूँकि α = 1.9% < 5%, अतः (1 − α ≈ 1) सन्निकटन पूरी तरह मान्य है।
3. [H+] = cα = 0.05 × 0.019 = 9.5 × 10−4 M।
4. pH = −log(9.5 × 10−4) = 4 − log(9.5) = 4 − 0.978 = 3.02।
उदाहरण 2: 25°C पर 10⁻⁸ M NaOH जलीय विलयन का pH क्या होगा?
सही उत्तर: pH = 7.02
चरणबद्ध हल:
1. अत्यंत तनु क्षारीय विलयनों में जल के स्वतः आयनन से प्राप्त OH− की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
2. माना जल से प्राप्त [OH−] = x।
कुल [OH−] = 10−8 + x, तथा [H+] = x।
3. Kw = [H+][OH−] = x(10−8 + x) = 10−14।
4. x2 + 10−8 x − 10−14 = 0 ⇒ x ≈ 0.95 × 10−7 M।
5. कुल [OH−] = 1.05 × 10−7 M ⇒ pOH = −log(1.05 × 10−7) ≈ 6.98।
6. pH = 14 − pOH = 14 − 6.98 = 7.02 (अल्प क्षारीय)।

6. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. क्या कोई पदार्थ ब्रान्स्टेड अम्ल और ब्रान्स्टेड क्षारक दोनों की तरह कार्य कर सकता है?
हाँ! ऐसे पदार्थों को उभयप्रोटॉनी (amphiprotic) कहा जाता है। प्रमुख उदाहरण जल (H2O प्रोटॉन देकर OH− बनाता है अतः अम्ल है, तथा प्रोटॉन ग्रहण कर H3O+ बनाता है अतः क्षारक भी है) और बाइकार्बोनेट आयन (HCO3− प्रोटॉन ग्रहण कर H2CO3 तथा प्रोटॉन त्यागकर CO32− बनाता है) हैं।
2. संतृप्त H2S विलयन में [S²⁻] लगभग Ka2 के बराबर क्यों होती है?
H2S(aq) ⇔ 2H+(aq) + S2−(aq) के लिए कुल वियोजन स्थिरांक K = Ka1 · Ka2 = [H+]2 [S2−] / [H2S] होता है। चूँकि Ka1 ≫ Ka2, अतः लगभग समस्त H+ प्रथम पद से आता है जहाँ [H+] ≈ [HS−]। द्वितीय पद के साम्य Ka2 = [H+][S2−] / [HS−] में [H+] व [HS−] परस्पर निरस्त हो जाते हैं, जिससे [S2−] ≈ Ka2 शेष बचता है।
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